
अरुणा रावत “अरू”, प्रसिद्ध लेखिका, नई दिल्ली
देह की देहरी लांघ कर कभी मुझ तक आ न पाओगे
मैं सर से पाँव तक
बाहर से गहरे भीतर तक हृदयवत हूँ।
इस शरीर के खोल की दीवारें कछुए की पाई हैं मैंने।
ये बदन भोग्य नहीं , एक मंदिर है,
जिसमें स्वयम् की प्रतिमा स्थापित है
जिसकी द्वार-पालिका मैं ख़ुद हूँ।
केवल देह नहीं मैं,
हिमालय का अंतिम छोर भी नहीं मैं।
दुर्गम बीहड़ों का कोर भी नहीं मैं।
सियही अमावस्या की रात भी नहीं मैं।
मादक ब्रह्म-बेला भी तो नहीं मैं।
भोर की दिशा-ओर भी नहीं मैं।
ये आयाम कदाचित तुम पार कर जाओगे।
पर न छू सकें जो हृदय मेरा
देह की देहरी लांघ कर कभी मुझ तक आ न पाओगे।

बहुत ही सुंदर तरीके से सीमाओं को दर्शाया आपने ।
शुक्रिया।