
सुष्मिता हाल्दार, प्रसिद्ध लेखिका, नई दिल्ली
मुद्दों की बात हम करते नहीं,
बेकार झंझट में पड़ते नहीं।
फ़िज़ूल की माथा-पच्ची है,
इनसे गज भर दूरी अच्छी है।
मुसीबत जब तक न सिर पर पड़े —
इनके चक्कर में कौन फँसे?
सड़कें टूटी पड़ी रहें,
खाने में मिलावट पूरी रहे।
पेड़ धड़ाधड़ कटते रहें,
कंक्रीट के जंगल बढ़ते रहें।
बिजली की किल्लत और बढ़े,
या पानी गलियों में बहे।
सड़क किनारे झुग्गी बने,
या फिर उन पर दुकानें सजें।
कूड़े का ढेर पहाड़ बने,
नाले में मच्छर का घर बसे।
अस्पताल के खर्चे होते रहें,
परीक्षा के पर्चे बिकते रहें।
महंगाई की मार यूँ ही चले,
भ्रष्टाचार अनर्गल फूले-फले।
जब काम कोई करता नहीं,
हमें भी फर्क पड़ता नहीं।
सुध किसे है भला यहाँ पर?
कोई जिए या फिर जाए — मर…
मुद्दों की बात हम करते नहीं,
बेकार झंझट में पड़ते नहीं।

सही कहा – मुद्दों की हम बात नहीं करते