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एंटीडाट

हमारे समय की विडंबना यह है कि जो शिक्षा कभी आदर्शों का मंदिर थी, वही अब सौदेबाज़ी के गलियारों में बदलती जा रही है। मेडिकल डिग्री पाने की होड़ में लुटे गए विद्यार्थी, जब डॉक्टर बनकर समाज में उतरते हैं, तो कुछ सच में ईश्वर का रूप बनकर सेवा करते हैं, पर कुछ वही लूट की परंपरा विरासत में लेकर आगे बढ़ते दिखते हैं। बीमारी का इलाज तो मिलता है, पर कई बार इलाज जेब का भी हो जाता है। सेवा और मेवा के बीच की पतली रेखा धुंधली पड़ती जा रही है। ऐसे में सवाल यही उठता है. लालच की इस बीमारी का असली “एंटीडाट” आखिर कहाँ मिलेगा?…….
मधु चौधरी की एक व्यंग्य रचना

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मुद्दों की बात हम करते नहीं…

हम इस देश में असल मुद्दों पर बात करना पसंद नहीं करते। हमें झंझट पसंद नहीं, इसलिए टूटी सड़कों, मिलावट वाले खाने, बढ़ते कंक्रीट, बिजली-पानी की किल्लत तक सब सहते जाते हैं। भ्रष्टाचार और महंगाई बढ़ती रहे, पर्चे बिकते रहें, कूड़े के पहाड़ बन जाएँ फिर भी फर्क नहीं पड़ता। हम तमाशा देखते रहते हैं। असल में हमें मुद्दे नहीं, आराम चाहिए। यही वजह है कि हालात बदलते नहीं और हम भी नहीं।

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