पाबल में आयोजित प्रवचन सभा के दौरान आचार्य श्री राजरक्षितसूरिजी समाज में सच्चे इंसान के अभाव और पर्यावरण संरक्षण पर विचार रखते हुए

सच्चे इंसान का सबसे बड़ा अकाल

पाबल स्थित श्री पद्मप्रभ स्वामी जिनालय में आयोजित प्रवचन सभा में आचार्य श्री राजरक्षितसूरिजी ने कहा कि दुनिया में सबसे बड़ा अकाल पानी, अनाज या पेट्रोल का नहीं बल्कि सच्चे इंसान का है, और यदि समय रहते स्वार्थ, भ्रष्टाचार और प्रकृति के विनाश को नहीं रोका गया तो आने वाली पीढ़ियों को शुद्ध हवा और पानी के लिए संघर्ष करना पड़ेगा.

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एंटीडाट

हमारे समय की विडंबना यह है कि जो शिक्षा कभी आदर्शों का मंदिर थी, वही अब सौदेबाज़ी के गलियारों में बदलती जा रही है। मेडिकल डिग्री पाने की होड़ में लुटे गए विद्यार्थी, जब डॉक्टर बनकर समाज में उतरते हैं, तो कुछ सच में ईश्वर का रूप बनकर सेवा करते हैं, पर कुछ वही लूट की परंपरा विरासत में लेकर आगे बढ़ते दिखते हैं। बीमारी का इलाज तो मिलता है, पर कई बार इलाज जेब का भी हो जाता है। सेवा और मेवा के बीच की पतली रेखा धुंधली पड़ती जा रही है। ऐसे में सवाल यही उठता है. लालच की इस बीमारी का असली “एंटीडाट” आखिर कहाँ मिलेगा?…….
मधु चौधरी की एक व्यंग्य रचना

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मुद्दों की बात हम करते नहीं…

हम इस देश में असल मुद्दों पर बात करना पसंद नहीं करते। हमें झंझट पसंद नहीं, इसलिए टूटी सड़कों, मिलावट वाले खाने, बढ़ते कंक्रीट, बिजली-पानी की किल्लत तक सब सहते जाते हैं। भ्रष्टाचार और महंगाई बढ़ती रहे, पर्चे बिकते रहें, कूड़े के पहाड़ बन जाएँ फिर भी फर्क नहीं पड़ता। हम तमाशा देखते रहते हैं। असल में हमें मुद्दे नहीं, आराम चाहिए। यही वजह है कि हालात बदलते नहीं और हम भी नहीं।

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रावण का कद बढ़ रहा है ?

यह लेख दशहरे के प्रतीक रावण के पुतले को मात्र लकड़ी और कागज़ का नहीं बल्कि समाज में बढ़ते अहंकार, लालच, क्रोध और दिखावे का प्रतीक बताता है। जैसे-जैसे पुतले का कद हर साल बढ़ता है, वैसा ही हमारे विचारों और आचरण में भी बुराई का आकार बढ़ रहा है। असली विजयादशमी तब होगी जब हम केवल पुतले जलाने तक सीमित न रहकर अपने भीतर के अहंकार, ईर्ष्या और क्रोध को जलाएँ, दूसरों की सफलता से प्रेरणा लें और सादगी, सत्य और नैतिकता को जीवन का आधार बनाएँ। लेख समाज में व्याप्त बुराई और दिखावे के प्रति चेतावनी देते हुए पाठकों को आत्मचिंतन और सकारात्मक परिवर्तन की ओर प्रेरित करता है।

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रावण बहुतेरे

आज रावण के पुतले भले ही जलाए जाएँ, लेकिन वास्तविक रावण अब दस सिर वाले नहीं हैं। वे एक सिर वाले हैं और समाज में असंख्य रूपों में मौजूद हैं। जहाँ बाहर श्याम वस्त्रों में रावण का प्रतीक जलता है, वहीं श्वेत वस्त्रों में छुपे अनेक रावण रोज़ हमारे बीच घूमते हैं। यह रावण अब केवल सीता-हरण तक सीमित नहीं रहे, बल्कि हर दिन न जाने कितनी सीताओं का अपहरण और चीर-हरण होता है। मासूमियत की नीलामी होती है और हवस की भट्टी में उसका भस्म किया जाता है। असली चुनौती इन सफेदपोश रावणों का दहन करने की है। सच्चा विजयदशमी तभी होगी जब इनका सर्वनाश किया जाए।

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समाज की संवेदनहीनता पर आधारित हिंदी कविता, जिसमें गंदगी, सफाई कर्मी की पीड़ा, पुल हादसा, अस्पताल लापरवाही और शिक्षा के व्यवसायीकरण को दर्शाया गया है

छोड़ो ना अपना क्या जाता है… 

हर बार जब समाज की किसी समस्या पर हम चुप रह जाते हैं और सोचते हैं“अपना क्या जाता है”, तब इंसानियत थोड़ा और मर जाती है। यह कविता उसी संवेदनहीन सोच पर तीखा प्रहार करती है।

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सिस्टम, सिस्टमैटिकली बच निकला..

तो ख़बर ये है, मित्र… कि सिस्टम हमेशा की तरह सिस्टमैटिकली अपने बाल भी बाँका किए बिना फिर से बच निकला है, जैसे उसे संविधान की किसी फुटनोट में कोई स्पेशल छूट मिली हो.
एक बार फिर, एक स्कूल की छत ढह गई और हमेशा की तरह, मासूम बच्चे ढहती दीवारों के नीचे दब गए. कुछ घायल हुए, कुछ अनंत यात्रा पर निकल लिए…
आप कहेंगे, ऐसी तो और भी इमारतें ध्वस्त हुई हैं भूस्खलन हुआ, बाढ़ आई, करंट लगने से भी अच्छे-खासे जान और माल की हानि हुई फिर आप इस एक सरकारी इमारत के पीछे क्यों पड़े हैं?
बस इसीलिए कि ये सरकारी थी.
सरकार इधर खुद की जोड़-तोड़ में लगी है. एक बार फिर आपने उसे व्यस्त कर दिया ङ्गहमें दुःख हैफ की बजरी, ङ्गदोषियों को बख्शा नहीं जाएगाफ के सीमेंट और सरकारी ब्रांड के मगरमच्छी आँसुओं का पानी मिलाकर एक गाढ़ा लेपन तैयार हुआ है जिससे की जाएगी लीपापोती.

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