पहचान लिखो…
एक उम्र-दराज़ औरत अपने वजूद की दास्तान खुद नहीं. उस नज़र से लिखवाना चाहती है जो उसे सच में समझती है। दुनिया ने उसे अपने पैमानों से तौला, पर वह बस इतना चाहती है कि कोई उसे “इंसान” की तरह लिखे।

एक उम्र-दराज़ औरत अपने वजूद की दास्तान खुद नहीं. उस नज़र से लिखवाना चाहती है जो उसे सच में समझती है। दुनिया ने उसे अपने पैमानों से तौला, पर वह बस इतना चाहती है कि कोई उसे “इंसान” की तरह लिखे।
ह की देहरी लांघकर तुम कभी मुझ तक नहीं आ पाओगे। मैं केवल बाहर से दिखाई देने वाला शरीर नहीं हूँ, मैं सिर से पाँव तक, बाहर से भीतर तक सम्पूर्ण हृदयवत हूँ। इस शरीर के खोल की दीवारें मैंने कछुए जैसी मजबूत बनाई हैं। यह बदन भोग्य नहीं, यह एक मंदिर है, जिसमें मैंने स्वयं की प्रतिमा स्थापित की है और उस द्वार की प्रहरी मैं स्वयं हूँ।