
अरुणा रावत अरू, प्रसिद्ध लेखिका, नई दिल्ली
माँ होना मेरा अपराध हो गया,
एक पत्थर-सा वजूद मुझ पर शाद हो गया।
चलाए हैं कितने ही वार छैनीयों के मेरे किरदार पर —
हर कोई बुतराश हो गया।
न गढ़ सका मेरे अस्तित्व को, किया है दोषित, अपने ही माफ़िक हर किसी ने,
हर कोई इंसाफ का पैरोक़ार हो गया।
न पूछा कभी किसी ने, क्या चाहती हूँ मैं?
हर कोई सवालों की मुझ पर बौछार हो गया।
बस अजनसी-सी चाहत थी… जीने की अपनी चाहत।
ख़ैर… अब तो याद भी नहीं, कब जिया था ख़ुद को।
एक अरसा गुज़रा… वो किस्सा तमाम हो गया।
