वजूद की छैनी

माँ होना जैसे मेरा सबसे बड़ा अपराध बन गया। हर कोई मेरे किरदार को अपनी-अपनी सुविधानुसार तराशता रहा। किसी ने कभी नहीं पूछा कि मैं क्या चाहती हूँ .क्या चाह कर जियूँ, कैसे जीना चाहूँ। सबने सिर्फ़ अपने अपने फैसले मेरे ऊपर रख दिए। सवाल, ताने, धारदार जजमेंट सब मुझ पर ही बरसते रहे। मेरी अपनी छोटी-सी चाहत, अपनी-सी ज़िंदगी… कब छूट गई, मुझे याद भी नहीं। बस इतना समझ आया है कि मैं कहीं रास्ते में ही पीछे रह गई और “मैं” का वो छोटा-सा किस्सा, बहुत पहले तमाम हो चुका है।

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सुनहरा छाता

किसी को कुछ बताना भी नहीं चाहती थी। किसे बताती? कौन सुनता? आँसू तो पहले ही सूख चुके थे। वो बस उस सुनहरे छाते को देखती आगे बढ़ रही थी। शायद उसी छाते के नीचे थोड़ी गुनगुनी धूप मिले… बिना रोक-टोक… बिना बाँधन।
पर तभी एक चीख गूँजी। लोग भागकर इकट्ठे हुए। सायरन बजाती एम्बुलेंस आई और एक शरीर उठा ले गई। इस घर में उसी घर में जिसके लिए उसने अपना मायका छोड़ा… खून के रिश्ते छोड़े बस सन्नाटा फैल गया। राकेश काला चश्मा लगाकर आया और बस इतना कहा “सब ख़त्म हो गया।”

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