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वजूद की छैनी

माँ होना जैसे मेरा सबसे बड़ा अपराध बन गया। हर कोई मेरे किरदार को अपनी-अपनी सुविधानुसार तराशता रहा। किसी ने कभी नहीं पूछा कि मैं क्या चाहती हूँ .क्या चाह कर जियूँ, कैसे जीना चाहूँ। सबने सिर्फ़ अपने अपने फैसले मेरे ऊपर रख दिए। सवाल, ताने, धारदार जजमेंट सब मुझ पर ही बरसते रहे। मेरी अपनी छोटी-सी चाहत, अपनी-सी ज़िंदगी… कब छूट गई, मुझे याद भी नहीं। बस इतना समझ आया है कि मैं कहीं रास्ते में ही पीछे रह गई और “मैं” का वो छोटा-सा किस्सा, बहुत पहले तमाम हो चुका है।

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