
प्रमिला पांडेय, कानपुर
बंद खिड़कियों से जब आकर झाँके आधी रात में,
चाहा अपने मन की कह दूँ बातें सारी बात में।
नज़र उठाकर देखा तुमको भूल गई आपा अपना,
ख़्वाबों में ही लगी सँजोने भोर का हो जैसे सपना।
दबे पांव जब दीवारों पर आकर दस्तक दी तुमने,
लाज-शर्म से घायल होकर छुपा लिया चेहरा हमने।
पाकर एक स्पर्श तुम्हारा भीगी ज्यों बरसात में,
चाहा अपने मन की कह दूँ बातें सारी बात में।
यमुना तट पर लहरों के संग करती जब आंख-मिचौनी,
ढूँढ-ढूँढ कर वो भी तुमको बाँध रही थी मौली।
छुपती, गिरती, फिर इठलाती बढ़ जाती हैं आगे,
उन्हें पकड़ने को तुम उनके पीछे-पीछे भागे।
हार मानकर जब थक जाएं छुपती पीपल-पात में,
चाहा अपने मन की कह दूँ बातें सारी बात में।
बाग, बगीचे, अमराई और पीपर-नीम सभी चाहें,
पाने को स्पर्श तुम्हारा अडिग पसारे हैं बाँहें।
लेकिन तुम तो जन्म-जन्म से अविरल चलते रहते हो,
शहर-शहर और गाँव-गाँव में आवारा-सा फिरते हो।
रोज़ रात को चलते जैसे तारों संग बारात में,
चाहा अपने मन की कह दूँ बातें सारी बात में।
