gulmohar
बाढ़ के बीच प्रकृति के विकराल रूप को दर्शाती हिंदी कविता

प्रकृति का कहर

प्रकृति जब विकराल रूप धारण करती है तो इंसान ही नहीं, पशु-पक्षी और जीव-जंतु भी संकट में पड़ जाते हैं. यह कविता प्रकृति के साथ किए जा रहे खिलवाड़ और पर्यावरण संतुलन की आवश्यकता पर सवाल उठाती है.

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महिदपुर रोड में 62 तपस्वियों के भव्य वरघोड़े में शामिल श्रद्धालु

श्रद्धा का विराट कारवां,. तप की यात्रा

महिदपुर रोड में 62 तपस्वियों की तपस्या पूर्णाहुति पर भव्य वरघोड़ा निकाला गया. करीब 3000 लोगों की सहभागिता वाले आयोजन में मुस्लिम और सिख समाज ने तपस्वियों का सम्मान कर सर्वधर्म समभाव की मिसाल पेश की.

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अस्सी घाट पर बेटे की रक्षा के लिए बैसाखी उठाए खड़ी माँ

माँ

अस्सी घाट की भीड़ में एक अपंग माँ अपने मासूम बेटे को अपमानित होते देख बैसाखी उठाकर उसके सामने दीवार बन जाती है. माँ की ममता और स्वाभिमान की यह मार्मिक कहानी दिल छू लेती है.

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गाँव के पुराने घर में दादू और पोते के भावुक मिलन का दृश्य

ख़ामोश घर की दीवारें फुसफुसाती हैं

दादू की आँखों में वर्षों से पल रहे इंतज़ार को जब पोता समझता है, तो रिश्तों, मिट्टी और अपनी जड़ों से जुड़ने की एक भावुक कहानी सामने आती है.

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उम्मीदों के टूटने से दुखी महिला की भावनात्मक कहानी

ख़ामोश इंतज़ार

सान्वी ने अपने दिल के चारों ओर दीवार खड़ी कर ली थी, लेकिन विहान के भरोसे ने उसे फिर से रिश्ते पर विश्वास करना सिखाया. जब वही भरोसा और उम्मीदें टूटने लगीं, तो उसे एहसास हुआ कि उम्मीदों का दर्द दिल टूटने से कहीं गहरा होता है.

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ख़ामोश शाम में पुरानी यादों से घिरी स्त्री और अपनी ही आवाज़ सुनती हुई

अपनी ही आवाज़

कुछ रिश्ते मुकम्मल नहीं होते, फिर भी उम्र भर महसूस होते हैं। ‘अपनी ही आवाज़’ बीती यादों, अधूरे रिश्तों और उस अतीत की कविता है, जो ख़ामोशी में आज भी आवाज़ देता है।

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पुश्तैनी घर के आँगन में लौटता रवि और ख़ामोश दीवारें

ख़ामोश घर की दीवारें फुसफुसाती हैं

बरसों से सूना पड़ा पुश्तैनी घर आज भी अपने लोगों की आहट का इंतज़ार कर रहा है। रवि जब लौटता है, तो दीवारें, चूल्हा, गुलमोहर और आँगन की तुलसी उसे बीते रिश्तों और यादों की कहानी सुनाते हैं।

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प्रतिभावान स्त्री की मनोव्यथा और स्त्री-विरोधी मानसिकता

प्रतिभा से डरता समाज, चरित्र पर उठाता सवाल !

एक स्त्री जब मेहनत, प्रतिभा और संघर्ष से अपनी पहचान बनाती है, तो उसकी उपलब्धियों के बजाय उसके चरित्र पर सवाल क्यों उठते हैं? यह लेख इसी सामाजिक मानसिकता और प्रतिभावान स्त्री की मनोव्यथा को सामने रखता है।

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