प्रकृति का कहर
प्रकृति जब विकराल रूप धारण करती है तो इंसान ही नहीं, पशु-पक्षी और जीव-जंतु भी संकट में पड़ जाते हैं. यह कविता प्रकृति के साथ किए जा रहे खिलवाड़ और पर्यावरण संतुलन की आवश्यकता पर सवाल उठाती है.

प्रकृति जब विकराल रूप धारण करती है तो इंसान ही नहीं, पशु-पक्षी और जीव-जंतु भी संकट में पड़ जाते हैं. यह कविता प्रकृति के साथ किए जा रहे खिलवाड़ और पर्यावरण संतुलन की आवश्यकता पर सवाल उठाती है.
महिदपुर रोड में 62 तपस्वियों की तपस्या पूर्णाहुति पर भव्य वरघोड़ा निकाला गया. करीब 3000 लोगों की सहभागिता वाले आयोजन में मुस्लिम और सिख समाज ने तपस्वियों का सम्मान कर सर्वधर्म समभाव की मिसाल पेश की.
एक रात प्रेम और साथ से भरी थी, दूसरी रात सिर्फ़ स्मृतियों और मीठी टीस के साथ रह गई. यह कविता बीते प्रेम की उसी कसक को शब्द देती है.
दादू की आँखों में वर्षों से पल रहे इंतज़ार को जब पोता समझता है, तो रिश्तों, मिट्टी और अपनी जड़ों से जुड़ने की एक भावुक कहानी सामने आती है.
सान्वी ने अपने दिल के चारों ओर दीवार खड़ी कर ली थी, लेकिन विहान के भरोसे ने उसे फिर से रिश्ते पर विश्वास करना सिखाया. जब वही भरोसा और उम्मीदें टूटने लगीं, तो उसे एहसास हुआ कि उम्मीदों का दर्द दिल टूटने से कहीं गहरा होता है.
चुभती ख़ामोशी, डराता सन्नाटा और रात की बेचैन शांति—‘रात को जलाने आई हूँ’ इन्हीं भावों के बीच अंतर्मन की आवाज़ और विद्रोह को शब्द देती है।
कुछ रिश्ते मुकम्मल नहीं होते, फिर भी उम्र भर महसूस होते हैं। ‘अपनी ही आवाज़’ बीती यादों, अधूरे रिश्तों और उस अतीत की कविता है, जो ख़ामोशी में आज भी आवाज़ देता है।
बरसों से सूना पड़ा पुश्तैनी घर आज भी अपने लोगों की आहट का इंतज़ार कर रहा है। रवि जब लौटता है, तो दीवारें, चूल्हा, गुलमोहर और आँगन की तुलसी उसे बीते रिश्तों और यादों की कहानी सुनाते हैं।
एक स्त्री जब मेहनत, प्रतिभा और संघर्ष से अपनी पहचान बनाती है, तो उसकी उपलब्धियों के बजाय उसके चरित्र पर सवाल क्यों उठते हैं? यह लेख इसी सामाजिक मानसिकता और प्रतिभावान स्त्री की मनोव्यथा को सामने रखता है।