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मासूम सपने

अष्टमी के दिन गिन्नी और सक्षम को खेलने का मौका मिला। गिन्नी की विधवा माँ चाची की मदद में व्यस्त थीं, इसलिए बच्चों को थोड़ी आज़ादी मिली। सक्षम बड़े मासूम अंदाज़ में गिन्नी से पूछता है कि वह रोज उसके साथ क्यों नहीं खेलती। गिन्नी बताती है कि उसे पढ़ाई करनी है, क्योंकि माँ कहती हैं कि लड़कियाँ ज्यादा नहीं पढ़तीं, उन्हें घर के कामों के लिए तैयार रहना चाहिए।

सक्षम चाहता है कि वह भी अपने पापा को ढूँढे और घर वापस लाए, लेकिन गिन्नी उसे समझाती है कि ऊपर आकाश में सब लोग गुम हो जाते हैं। दोनों भाई-बहन अपने छोटे-छोटे सपनों और मासूम बातचीत में उलझे हुए हैं। चाची की चीखती आवाज उन्हें जगाती है, और गिन्नी की आँखों में चमकते सपने कुछ पल में बिखर जाते हैं। यह कहानी बच्चों की मासूमियत और उनके भीतर की संवेदनशीलता को दर्शाती है।

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नारी द्वारा नारीत्व का परित्याग

समाज में नारी की भूमिका और नारीत्व आज गंभीर परिवर्तन का सामना कर रहा है। जहाँ सदियों से नारी को ममता, कोमलता और जीवन देने वाले स्वरूप के रूप में देखा गया, वहीं अब वही नारी कई परिस्थितियों में अत्याचार, विषाक्त जीवन और अन्याय के खिलाफ प्रचंड स्वरूप धारण कर रही है।

कई मामलों में नारी अपने बच्चों या परिवार के प्रति परंपरागत ममता के बजाय अपने जीवन के बंधनों से मुक्त होने का प्रयास करती है। यह कदम कभी-कभी उस विषाक्त वातावरण का प्रतिरोध होता है, जो उसे हर दिन मानसिक और शारीरिक रूप से चोट पहुँचाता है।

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मातरानी के अनन्य स्वरूप

मातारानी की महिमा असीमित और अनन्य है। सृष्टि की हर क्रियाशीलता में उनका वंदन और पूजन होता है। दया, शांति, चेतना और सामर्थ्य के प्रतिरूप के रूप में, माँ ज्ञान से पूर्ण प्रकाशपुंज हैं। वह जीवन की सर्वशक्तिप्रदायिनी हैं, जो समस्त जगत की असुरी शक्तियों का संहार करती हैं और यश, रूप, आरोग्य व सौभाग्य प्रदान करती हैं।

माँ अमिय-स्रोत जैसी निरंतर नाद करती हैं और दुष्टों का दमन करने के लिए विकराल रूप धारण कर लेती हैं। प्रचंड दामिनी और रमा कामिनी के स्वरूप में वह भक्तों के हर संताप को हरती हैं और उनके मनोवांछित फल प्रदान करती हैं।

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तन भादों, मन सावन

प्रेम में भीगकर तन-मन तरबतर हो जाता है। प्रिय की पनीली निगाहें जब देखती हैं तो भीतर जल-प्लावन-सा उमड़ पड़ता है। बहकी-बहकी हवाएँ चलती हैं तो तन और मन दोनों ही भाव-विभोर हो जाते हैं। मिलन और बिछोह का अनुभव मानो झूलों के आवागमन जैसा प्रतीत होता है। प्रिय के बदन को छूकर गुजरती हवाओं में सागर-सा लावण्य घुल जाता है। जब से वह मन के द्वार पर आया है, तन-मन उसका घर-आँगन बन गया है। अंतरतम में उसके बस जाने से तन मंदिर और मन पावन हो गया है।

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शिव की शिवा 

सम्पूर्ण वातावरण ढोल, ढाक और ताशों की लयबद्ध ध्वनि से गूँज रहा था। घर-घर से दुर्गा स्तोत्र और आरती के साथ शंख और घंटियों की आवाज़ें आ रही थीं। शारदीय नवरात्र और देवी दुर्गा मइया की भक्ति में शहर डूबा था।नौमी की संध्या-आरती के बाद मालकिन ने फलाहार किया और रेशमा को भी खाने दिया। रेशमा, जिसे बचपन से मालकिन ने गोद में रखा और नाम दिया था, उनकी हर बात और हर काम का अनुसरण करती थी।
शरद की ठंडी रात में, मालकिन ने खिड़की से देखा कि एक लड़की बेतहाशा भाग रही है — पीछे दो-तीन गुंडे उसका पीछा कर रहे थे। लड़की की पीठ और बाँह घायल थी। मालकिन तुरंत देवी माँ से प्रार्थना करती हुई उसके पीछे दौड़ीं।

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जिंदगी के पन्नों में तुम्हारा स्पर्श

मैं एक किताब थी, धूल भरी लाइब्रेरी के कोने में पड़ी हुई। पन्ने पुराने थे, कवर किसी को आकर्षित करने लायक नहीं। एक ऐसी किताब जिसे शायद ही कभी पढ़ा गया हो।

एक दिन तुम मुझसे टकराए। तुमने मुझे उठाया और पढ़ना शुरू किया। पहले पन्ने पर मेरी प्रस्तावना पढ़ते ही मुझे डर लगा कि अब तुम मेरी सोच और भावनाओं को आंक दोगे। पर जैसे ही तुमने आगे पढ़ा, तुम मुस्कुराए। तुम्हारी मुस्कान ने मुझे जिम्मेदारी का एहसास कराया – कि तुम्हें निराश नहीं होने दूँगी।

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पापा, मुझे विदा कर दो…

कविता में एक अनजानी और अबोध आत्मा की पुकार है, जो जन्म लेने से पहले ही अपने जीवन की चुनौतियों और समाज में बढ़ती खतरे की भविष्यवाणी करती है। यह भावनात्मक रचना बताती है कि कैसे एक बच्चा, अपनी मासूमियत में, पहले से ही सुरक्षा और संरक्षण की लालसा रखता है, और कैसे वह अपनी सुरक्षा के लिए माता-पिता से प्रार्थना करता है कि उसे जन्म से पहले ही सुरक्षित स्थान पर रखा जाए। यह कविता सामाजिक चेतना और संवेदनशीलता को उजागर करती है।

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बादल फटने की त्रासदी

वर्ष 1983 में मेरी प्रथम प्रशासनिक तैनाती के दौरान अल्मोड़ा जिले के दूरस्थ करमी गाँव में घटित बादल फटने की घटना ने मुझे पहाड़ों में जीवन और प्राकृतिक आपदाओं की भयावहता का जीवंत अनुभव कराया। पैदल मार्ग से उच्च पहाड़ी इलाक़ों तक पहुँचना कठिन था, लेकिन गाँववालों की व्यथा और घटना के दृश्य ने मेरी संवेदनाएँ झकझोर दीं। इस घटना में लोगों के घर बह गए, कई लोग घायल हुए और मृतक भी हुए। उस समय का अनुभव आज भी मेरी स्मृति में जीवंत है और यह प्रशासनिक कार्य के दौरान मिली असली चुनौती और सीख का प्रतीक बना।

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बहुत जी करता है

मैं जीना चाहती हूँ उन क्षणों को जब ब्रज में कृष्ण अपनी लीलाएँ रचते थे। नटनगर रास, बंसी की मधुर तान, गोपियों की हँसी और उनका अनन्य प्रेम—हर दृश्य हृदय में जीवंत हो उठता है। मैं देखना चाहती हूँ यशोदा मैया का लाल संग खेलना, सुदामा का स्नेह, और कान्हा की माखन चोरी। कभी-कभी लगता है कि यह भाव किसी पुराने युग की स्मृति है—शायद मैं भी कोई गोपी थी या ललिता जैसी सखी। मैं रुक्मिणी नहीं, बल्कि मीरा का विरह, राधा का अनन्य प्रेम और ब्रज की होली का उल्लास जीना चाहती हूँ।कृष्ण बनना सरल नहीं, पर उनके प्रेम में खो जाना—यही सबसे बड़ा सुख है।

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गढ़ देवी माई: आस्था और कृपा का अनुभव

मेरे मायके के निकट मढ़ौरा (सारण) में गढ़ देवी माई का प्राचीन मंदिर है, जो अपनी कृपा और सबकी मनोकामनाएं पूरी करने के लिए प्रसिद्ध है। वर्षों से उनके दर्शन की लालसा लिए मैं अवसर की तलाश में थी। आखिरकार, माता रानी ने मेरी प्रार्थना सुन ली और मैं अपने मंझले भैया के साथ गांव पहुंची।

वर्षों बाद अपने बाल्यकाल की धरती पर लौटना, पुराने संगी-साथियों और घर की यादों से मिलना अत्यंत सुखद था। दिसम्बर की ठंडी सुबह, घने कोहरे के बीच हम गढ़ देवी माई के दर्शन के लिए मंदिर पहुँचे। मां का अद्भुत सौंदर्य देखते ही मैं अभिभूत होकर भावुक हो उठी। माता ने अपने स्नेह और आशीर्वाद से हमें भर दिया—सपरिवार सुख और समृद्धि का आशीष।

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