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आत्मविश्वास से भरी एक भारतीय महिला, स्वतंत्र और सशक्त व्यक्तित्व को दर्शाती हुई

एक नारी की अभिव्यक्ति

यह कविता एक ऐसी स्त्री की आवाज़ है, जिसने रिश्तों के बोझ से ऊपर उठकर खुद को पहचानना सीख लिया है। वह अब समझौते नहीं करती, बल्कि अपने आत्मसम्मान और स्वतंत्रता के साथ जीना चुनती है।

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महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों पर अत्याचार बढ़े

यह लेख भारतीय समाज में महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों और जनजाति समुदायों के खिलाफ बढ़ते अपराधों पर केंद्रित है। एनसीआरबी के 2023 के आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों में लगातार वृद्धि हुई है, जिसमें घरेलू हिंसा, दहेज हत्याएं, अपहरण, बलात्कार और छेड़छाड़ के मामले प्रमुख हैं। बच्चों पर अत्याचारों में भी तेज़ी से वृद्धि हुई है, और बुजुर्ग व जनजाति समुदाय भी सुरक्षित नहीं हैं। लेख में यह भी बताया गया है कि केवल कानून और पुलिस की तत्परता ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि समाज में पुरुष प्रधान मानसिकता को बदलना और महिलाओं व बच्चों की सुरक्षा के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाना अनिवार्य है। यह स्थिति संकेत देती है कि सामाजिक और मानसिक स्तर पर व्यापक सुधार की आवश्यकता है।

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“मौन दरिया, बोलती रात”

यह कविता एक गहरे आत्ममंथन का चित्रण है, जिसमें कवि अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने की जद्दोजहद से गुजर रहा है। वह सोचता है कि आखिर क्या कहे, किससे कहे और कितना कहे, क्योंकि कहने की भाषा तक मौन हो चुकी है। जीवन में ऐसा सन्नाटा है जहाँ शरीर के अंग सुन्न पड़ चुके हैं और चारों ओर उदासीनता छाई है। कवि प्रश्न उठाता है कि किसके पास कितना “पानी” बचा है और किसे उसकी परवाह है। हर कोई अपनी ही धुन में, अपने ही राग में व्यस्त है। जीवन बस एक बहती हुई धारा की तरह है, जो मौन रहते हुए भी अपनी कहानी कहती जाती है।
दरिया का सन्नाटा भी मानो संदेश देता है कि कहीं ठहरना मत, आगे बढ़ते रहना। इस अंतर्द्वंद्व में कवि सोचता है कि दरिया से भी आखिर क्या कहा जाए, क्योंकि यहाँ तो भाषा भी मौन है और कोई किसी का नहीं है

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राब्ता : एक ग़ज़ल

राब्ता” एक ऐसे दिल की पुकार है, जो अपने ही रिश्ते में दूरी और उदासी महसूस करता है। शिकायत यह नहीं कि मोहब्बत कम है, बल्कि यह है कि समझने और अपनाने की कमी है। ख़्वाब सजाए गए हैं, मगर उन्हें पूरा करने वाली बाहों की गर्मी नहीं मिलती। रक़ीबों की जुर्रत चुभती है, लेकिन अपने परदे की हिफ़ाज़त करने वाला कहीं और खोया रहता है। आईने में भी अब चेहरा नहीं दिखता, क्योंकि नज़रें सिर्फ़ उसी हुस्न की तलाश में हैं। चाँद भी जब उसके दर पर आता है तो उसकी तवाज़ुन खो जाती है। मोहब्बत की क़वायदें शायद काफ़िरों जैसी नहीं होतीं, तभी तो दिल देने के बाद भी सुकून कहीं और नहीं मिलता।

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नवरात्रि: भक्ति से शक्ति की यात्रा

“नवरात्रि केवल पर्व नहीं, बल्कि आत्मा की यात्रा है। यह हमें हमारे भीतर की सुप्त शक्ति को पहचानने, हर कठिनाई में छिपे वरदान को देखने और आत्मविश्वास से अंधकार को मिटाने की प्रेरणा देता है।”

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जयपुर में राजस्थान लेखिका साहित्य संस्थान का भव्य सम्मान समारोह

जयपुर में लेखनी का महाकुंभ

जयपुर में 20 फरवरी 2026 को आयोजित राजस्थान लेखिका साहित्य संस्थान का सम्मान समारोह शब्द, सृजन और स्त्री संवेदना का अद्भुत संगम बन गया। समारोह में प्रतिष्ठित साहित्यकारों को सम्मानित किया गया तथा ‘हौसलों की उड़ान’ सहित कई कृतियों का भव्य विमोचन हुआ।

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ठंडी शाम में चाय के साथ पुरानी यादों में खोई महिला, मोबाइल स्क्रीन पर दोस्त से बातचीत

कुछ अनकहे रिश्ते…

कुछ अनकहे रिश्ते” एक मार्मिक कहानी है जो दोस्ती, ममता और विश्वास के उस पवित्र बंधन को दर्शाती है, जिसे नाम की आवश्यकता नहीं होती। यह रचना भावनाओं की गहराई और रिश्तों की सच्चाई को स्पर्श करती है।

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A lone figure standing at the edge of a quiet riverbank during early dawn, soft golden-blue light reflecting on the water. The person looks contemplative, gazing at gentle ripples as if questioning life’s truths. Surrounding nature appears symbolic—distant mountains, drifting

जीवन-मंथन

जीवन की हर बढ़ती घड़ी में मन बार-बार सवाल करता है सुख और दुख के इस लंबे सफ़र में हमने कितना देखा, क्या खोया और क्या पाया। माया अपनी चकाचौंध से हमें छलती रहती है, सत्ता और वैभव के प्रलोभन दिखाती है, और इन्हें पाने की चाह में हम अनगिनत अंधेरों से गुजरते हैं।

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दीवारें

बेटे के नए घर की चमक-दमक देखकर भी उसके मन में बस एक ही प्रश्न गूंजता रहा.“मेरी जगह कहाँ है?” कुछ दिन रुककर लौटी तो अपने पुराने घर की दीवारें भी जैसे समझा रही थीं.“अभी थकना नहीं… तेरे हिस्से का इंतज़ार अभी बाकी है।”

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शताब्दी वर्ष पर मोहन राकेश को याद किया ‘बतरस’ ने॰॰॰

मुंबई के केशव गोरे ट्रस्ट सभागार में सांस्कृतिक संस्था ‘बतरस’ के 27वें मासिक आयोजन में साहित्यकार मोहन राकेश की रचनात्मक विरासत पर चर्चा हुई। वक्ताओं ने उन्हें आधुनिक हिंदी साहित्य और नाटक का सशक्त स्तंभ बताते हुए कहा कि उनका साहित्य आज भी सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदनाओं के कारण प्रासंगिक है। कार्यक्रम में उनके नाटकों और कहानियों के अंशों की प्रभावशाली प्रस्तुतियाँ हुईं और समापन राष्ट्रगीत के साथ किया गया।

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