gulmohar

किसको ढोओगे

दिव्या सिंह, प्रसिद्ध लेखिका

किसको कंधों पर ढोओगे,
किसको तुम पार उतारोगे?
मझधार में नैय्या डूबेगी,
तो किस-किस को तुम तारोगे?
क्या सबको साथ में मारोगे?

सब डूब गए तो क्या होगा,
फिर किस पर राज करोगे तुम?
तुम हुक्म चलाओगे किस पर,
किसका उद्धार करोगे तुम?
क्या तुमको यह एहसास नहीं,
तुम भी तो एक दिन हारोगे—
क्या सबको साथ में मारोगे?

भारत के आँचल में सब हैं,
हर जाति-धरम मिलता है यहाँ।
इसकी धरती में ताक़त है,
कीचड़ में कमल खिलता है यहाँ।
एक दिन ऐसा भी आएगा,
अपनी ही ताक़त से हारोगे—
क्या सबको साथ में मारोगे?

जो आप कहें, वही सच होगा,
हम तो ग़रीब जन हैं साहब।
हम जाति-वाती क्या जानें,
हम तो उज्ज्वल मन हैं साहब।
क्या इस चुनाव में भी हम पर,
तुम आकर डोरे डालोगे?
क्या सबको साथ में मारोगे?

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18 thoughts on “किसको ढोओगे”

      1. शानदार पंक्तियां….देश में विषम परिस्थितियों को दृष्टिगत प्रासंगिक कविता…..शायद देश के नीति बनाने वाले लोगों को समझ में आ जाए ।

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