
रीता मिश्रा तिवारी, भागलपुर
मौत पर मेरी मातम मनाना नहीं,
अश्कों का कहर बरपाना नहीं,
दुखों के अंबार पर बैठकर मेरे,
दर्द का मखौल उड़ाना नहीं.
हँसी के फब्बारे बरसाने वाले,
हां..मेरी अर्थी को कांधा देना नहीं।
मायूसी की चादर ओढ़कर,
गमज़दा होकर बैठना नहीं,
कैसे कटेंगे अब दिन मेरे,
भले मानस थे ये कहकर मेरे,
तारीफों के पुल बांधना नहीं,
हां..मेरी अर्थी को कांधा देना नहीं।
सच्चाइयों पर पर्दा डालना नहीं,
इक नई कहानी बुनना नहीं,
दुःख का दिखावा करना नहीं,
रियलिटी का रील बनाकर मेरे,
शव पर संवेदना बटोरना नहीं,
हां..मेरी अर्थी को कांधा देना नहीं।
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बहुत आभार धन्यवाद आपका सुरेश जी