
डाॅ अनीता पंडा ‘अन्वी’, बैंगलुरू
आ गईं तुम? इस कोरे कागज़ और कलम को लिए कब तक यूँ ही बैठी रहोगी?”
“जब तक मेरे समीर के विरह की वेदना को सही शब्द नहीं मिल जाते,” श्वेता ने गंभीर स्वर में उत्तर दिया।
“यह सच है कि दर्द की पराकाष्ठा अभिव्यक्ति से परे होती है, पर उसे बाँटने से मन हल्का हो जाता है। वह तो शहीद होकर अमर हो गया है।”
“मैं इसे बाँटना नहीं चाहती, बल्कि उसकी स्मृतियों के साथ जीना सीखना चाहती हूँ। तुम बताओ, तुम इतनी पीड़ा कैसे सह लेती हो?” श्वेता ने सामने बहती जलधारा को देखते हुए पूछा।
” मैं जीवन के शाश्वत सत्य को सहजता से स्वीकार कर लेती हूँ और समय के साथ आगे बढ़ जाती हूँ।”
“मैं समझी नहीं। समीर के चले जाने के बाद मेरे लिए समय ठहर गया है और मेरी कलम लाचार हो चुकी है।”
“ज़रा मुझे देखो। मैं एक लंबी यात्रा तय करती हूँ, लेकिन कभी पीछे मुड़कर नहीं देखती। हवा के झोंकों से मचलती हूँ, सूर्योदय और सूर्यास्त की आभा को खुद में समेटती हूँ और राह में सबको बस स्नेह बाँटती चलती हूँ।”
“क्या तुम्हें सब कुछ खो जाने का भय नहीं होता? यहाँ तक कि अपने अस्तित्व के मिट जाने का भी?”
“निकल पड़ने के बाद भय कैसा? विलीन हो जाना ही तो मेरी मंज़िल है। तुम भी मत डरो, श्वेता। जो कुछ भी भीतर दबा है, उसे इस कोरे कागज़ पर उड़ेल दो। खुद को इस मानसिक क़ैद से आज़ाद करो।”
“सच कहा तुमने! अब मैं इस कोरे कागज़ पर अतीत का विलाप नहीं, बल्कि अपने भविष्य की योजना लिखूँगी। तुम्हारी तरह ही बिना रुके आगे बढ़ूँगी, मेरी प्यारी नदी!”
ठीक उसी पल, हवा के एक तेज़ झोंके ने नदी की कुछ शीतल बूँदें श्वेता के चेहरे पर बिखेर दीं।
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एक दार्शनिक दृष्टि की भावुक लघु कथा 👌
अति सुन्दर रचना।
इस कहानी के माध्यम से लेखिका यह समझाने का प्रयास करती हैं कि अतीत में खो जाना ज़िंदगी नही बल्कि नदी की अविरल धारा की तरह बहना ही ज़िंदगी है। जीवन के उतार चढ़ाव, सुख दुख को साथ लेकर और अतीत की परछाईयों से निकल कर हमें बस प्रेम बांटते अपना सफर तय करना है।
हार्दिक बधाई आदरणीय अनीता पंडा जी।
अच्छी कहानी। यथार्थ को कहती और संदेशपरक।