
प्रस्तुति-सुरेश परिहार (कीर्ति राणा की पुस्तक “किस्से कलमगिरी के” से)
यह कहानी एक ऐसे जांबाज पत्रकार की है, जिसने अपनी पत्रकारिता में कामरेडी अंदाज कभी नही छोड़ा.. वह इंदौर का कल का मुन्ना..आज शहर नहीं देश का एक अच्छे पत्रकारों में शुमार है यह कहानी उसी की जुबानी है. मुन्ना कैसे पत्रकार कीर्ति राणा बना. घटना, देशकाल वातावरण सभी उन्हीं की पुस्तक किस्से कलमगिरी से लिए गए हैं. (कीर्ति राणा की किताब किस्से कलमगिरी के पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण साबित होगी. ऐसा मेरा विश्वास है)
पुस्तक का यह संपादित अंश है. पूरा आर्टिकल किस्से कलमगिरी के में है.
जब नईदुनिया में नौकरी की कोशिश पड़ी भारी, भास्कर ने छीन ली लूना
क्रीम और काले रंग की वह लूना मेरे लिए सिर्फ आने-जाने का साधन नहीं थी, बल्कि पत्रकारिता के शुरुआती दिनों की साथी थी। प्रेस कॉन्फ्रेंस तब प्रेस क्लब, इंडियन कॉफी हाउस या आरएनटी मार्ग के अप्सरा होटल में हुआ करती थीं। कभी अपनी लूना पर यूनिवार्ता वाले बनवारी बजाज साब को बैठाकर ले जाता, कभी उनकी लूना पर मैं सवार हो जाता और कभी इंदौर समाचार के सिटी चीफ उमेश रेखे को साथ ले जाता। लूना ने कई बार पत्रकारिता के साथ जीवन के दूसरे रंग भी दिखाए। बारिश में पता चला कि पिछले पहिये पर मडगार्ड ही नहीं है और पीछे बैठने वालों की पैंट इसलिए गीली होती है, क्योंकि सीट का कवर बीच से फटा हुआ था। एक रात बारिश में कृष्णपुरा पुल से छतरियों की ओर जा रहा था कि आगे चल रहे साइकिल वाले के स्टैंड में लूना का ब्रेक वायर फँस गया। मैं गाड़ी सहित पानी से भरे मोड़ पर जा गिरा। साइकिल वाला पीछे मुड़ा, मेरी हालत देखी और रुकने के बजाय तेजी से पैडल मारकर निकल गया। अगले दिन गैरेज वाले ने ज्ञान दिया कि लूना का ब्रेक वायर आगे काफी बाहर रहता है। उसने तार बाँधकर उसे सुरक्षित कर दिया।
इसी लूना पर जिंदगी आगे बढ़ रही थी। शादी की तलाश भी जारी थी और आखिरकार 18 नवंबर 1986 को विवाह हुआ। शादी के बाद पहला आदेश मिला लूना की सीट ठीक करवाओ। वही लूना अब नवविवाहित जीवन की साथी बन गई। फिल्म, विवाह समारोह और यहाँ तक कि महाशिवरात्रि के ब्रह्म मुहूर्त में देवगुराड़िया के शिव मंदिर तक की यात्राएँ उसी पर होने लगीं। फिर दिसंबर 1986 में कहानी ने नया मोड़ लिया। डॉ. ओम नागपाल ने एक दिन नईदुनिया का सिटी पेज मेरे सामने रखकर बताया कि प्रशिक्षु पत्रकारों की जरूरत है। उन्होंने मुझे आवेदन करने के लिए प्रेरित किया। मैंने परीक्षा दी, लेकिन टॉप टेन में नाम नहीं आया। अभय छजलानीजी से बात की तो उन्होंने कहा कि अभी दस लोगों का चयन हुआ है, आगे जरूरत हुई तो विचार करेंगे।
शाम को कार्यालय पहुँचा तो एनई रमेश जोशी ने मुझे दस दिन के जबरिया अवकाश का नोटिस थमा दिया। आरोप यह था कि मैं दूसरे अखबार में जाने की तैयारी कर रहा हूँ। साथ ही आदेश था कि संस्थान की लूना तत्काल जमा कर दूँ।
मैंने पूछा, “लूना के दोनों टायर अभी बदले हैं, उनका बिल?”
बात आगे बढ़ी तो मैंने घर जाकर पुराने टायर निकाले और उन्हें लूना के हैंडल पर लटकाकर वापस कार्यालय पहुँच गया। दोनों टायर, पंचर का सामान, पाने, पेट्रोल निकालने की नली और गाड़ी साफ करने का कपड़ा रमेशजी की मेज पर रख दिया। फिर उनसे लिखवाया कि सारा सामान वापस मिल गया है। लूना जमा हुई और मैं दस दिन की छुट्टी पर चला गया। उन दस दिनों में बहुत सोचा। आखिर तय किया कि अब भास्कर में ही रहूँगा।
दिसंबर की कड़ाके की ठंड में परिवार के अन्नू यानी अनिल राठौर के साथ सुबह पाँच बजे स्कूटर से भोपाल पहुँचा और रमेश अग्रवालजी से मिला। उन्होंने गुस्से में पूछा कि मैंने नईदुनिया जाने के बारे में सोचा ही कैसे। मैंने माफी माँगी। अंततः उन्होंने मुझे सिटी डेस्क से हटाकर क्षेत्रीय डेस्क पर काम करने का अवसर दिया। नई जिम्मेदारी के साथ काम का ढंग बदला। क्षेत्रीय खबरें पेज वन पर जगह पाने लगीं और सर्कुलेशन में भी सुधार हुआ। संवाददाताओं से लगातार संपर्क रहने लगा। बाद में मुझे क्षेत्रीय डेस्क की जिम्मेदारी भी मिली।
लूना जा चुकी थी, इसलिए रात की ड्यूटी के बाद आने-जाने में समस्या हुई। आखिर ढाई हजार रुपये में सेकंडहैंड चेतक खरीदी। पहली बार स्कूटर चलाया और गैरेज वाले से ही गियर समझकर खजराना गणेश मंदिर पहुँच गया। वहाँ दादा भालचंद भट्ट ने पूजा कराई।वापसी में मधुमिलन सिनेमा की पुलिया के आगे अचानक ब्रेक ने जवाब दे दिया। सामने वाहन आ रहा था। मैंने बिजली के खंभे से टकराना बेहतर समझा। तभी एक लड़का आया। उसने जाँच की और ब्रेक पैड के नीचे फँसा नट-बोल्ट निकाल दिया। दुर्घटना टल गई। इसके बाद वह पुरानी चेतक भी लंबे समय तक साथ चली। पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है, लूना और चेतक सिर्फ वाहन नहीं थे। वे पत्रकारिता, नौकरी, शादी, संघर्ष और जिंदगी के उन दिनों के साथी थे, जिनकी याद आज भी मुस्कुरा देती है।

किस्से कलमगिरी के पुस्तक के मूल लेखक कीर्ति राणा (वरिष्ठ पत्रकार, इंदौर)
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