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दैनिक भास्कर में संपादक और रिपोर्टर के बीच संवाद को दर्शाता पुराने हिंदी समाचार कक्ष का दृश्य

मुन्ना से कीर्ति राणा

दैनिक भास्कर में बिताए वर्षों की कुछ यादें ऐसी हैं, जो एक संपादक के व्यक्तित्व के कई पहलुओं को सामने लाती हैं। श्रवण गर्ग के साथ खबरों पर तीखी बहस, रिपोर्टर की बेबाकी, कर्मचारियों के प्रति संवेदनशीलता और नाग-कोबरा वाला वह मजेदार प्रसंग न्यूज़रूम की एक अलग ही तस्वीर पेश करता है।

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वर्ष 2001 के आसपास अखबार के दफ्तर में तबादले का आदेश पढ़ता पत्रकार

मुन्ना से कीर्ति राणा

साल 2001 के आसपास दैनिक भास्कर में इंदौर से उज्जैन तबादले का यह संस्मरण पत्रकारिता के एक महत्वपूर्ण दौर की यादें समेटे है। कीर्ति राणा और शशींद्र जलधारी के पेशेवर संबंधों, संपादकीय घटनाक्रम, अखबारी राजनीति और परिवार के साथ लिए गए कठिन फैसले की यह कहानी बताती है कि एक आदेश किस तरह जिंदगी की दिशा बदल सकता है।

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पुराने इंदौर की सड़क पर खड़ी काइनेटिक होंडा और पत्रकारिता के दिनों की यादें

मुन्ना से कीर्ति राणा

भास्कर इंदौर की सिटी डेस्क की जिम्मेदारी मिलने से लेकर नई काइनेटिक होंडा और सांप्रदायिक तनाव के बीच रिपोर्टिंग तक, यह संस्मरण पत्रकारिता के उन दिनों की यादें समेटता है, जब हर खबर के साथ जोखिम और जिम्मेदारी जुड़ी होती थी।

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पत्रकारिता के शुरुआती दिनों में पुरानी क्रीम और काले रंग की लूना के साथ युवा पत्रकार

मुन्ना से कीर्ति राणा

पत्रकारिता के शुरुआती दिनों में क्रीम-काले रंग की लूना सिर्फ एक वाहन नहीं, बल्कि जिंदगी की साथी थी। नईदुनिया में प्रशिक्षु पत्रकार के पद के लिए इंटरव्यू देने के बाद भास्कर से लूना जमा कराने का नोटिस मिला। इसके बाद शुरू हुआ नौकरी, संघर्ष और नई जिम्मेदारियों का ऐसा सफर, जिसमें लूना से लेकर सेकंडहैंड चेतक तक कई यादें जुड़ गईं।

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