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प्यार के रंग

सफेद साड़ी पहने तुलसी के पास दीप जलाती एक विधवा स्त्री पहनावा बदल सकता है, लेकिन सच्चे प्रेम की गहराई नहीं।

प्रसिद्ध लेखिका अमिता कर की पुस्तक “अमावस्या में जन्मी” से एक कहानी

अमिता कर

ओडिशा में घर के किसी बड़े के गुजर जाने के बाद एक साल तक ब्राह्मण घर में कोई बड़ा पूजा-पाठ नहीं होता। विधवा पत्नी कार्तिक व्रत नहीं रखती। लेकिन इन सब नियमों को समझने का मन नहीं था। उनके असमय जाने ने मुझे अंदर से झकझोर दिया। अब जीवन में बचा ही क्या है? बस, स्थूल शरीर को ढो रही हूँ। संन्यास लेने की सोचती हूँ, लेकिन कोई मानने को तैयार नहीं। सबने कहा, व्रत मत रखो। अगर बीमार पड़ जाओगी तो कौन देखभाल करेगा? आजकल कौन ये सब करता है? पहले शरीर ठीक रहे, फिर सोचना।

नियम से एक बार खाना पड़ेगा। निष्ठा से महीने भर व्रत करना कितना मुश्किल है। रात चार बजे उठकर नहाना, पूजा-पाठ करना… सोचती थी, यह अब मुझसे नहीं होगा। नहीं कर पाऊँगी। फिर भी, जितने दिन कर पाऊँगी, कर लूँगी। मैं कोई पूरा उपवास रखकर थोड़े ही कर रही हूँ…। जीते जी अगर प्यार जताने का मौका मिल पाता, तो ठीक था। मरणोपरांत दस सेर घी जलाकर गीता यज्ञ करके खुद को समझा रही हूँ… कि देखो, मैं प्यार करती हूँ। तुम्हारे विधवा बनकर जी रही हूँ।
कभी सफेद साड़ी पहनने नहीं देते थे। सुदशा व्रत में ससुर जी ने लाल बॉर्डर वाली सफेद साड़ी दी थी, जो लक्ष्मी पूजा में पहननी थी। लेकिन उन्होंने साफ मना कर दिया। मैंने अपनी माँ को वह साड़ी दे दी थी। आज मन कहता है कि हमेशा सफेद साड़ी ही पहनूँ। सजना-सँवरना अब किसके लिए? प्यार की गहराई अब इंद्रधनुष के रंगों में नहीं, बल्कि मन की सादगी में है।

लाल रंग सुहागन नारी का प्रतीक है, लेकिन मैं तो विधवा हूँ। फिर भी, मेरे प्यार का कोई रंग नहीं है। न अब है, न तब था। प्यार तो प्यार है। आज भी उतना ही प्यार करती हूँ, जितना सुहागन के समय करती थी। पारिवारिक रिश्तों में प्यार का रंग विश्वास का होना चाहिए। ये काला, सफेद, लाल, नीला—ये रंग मन को मोहते हैं, आँखों को सुंदर लगते हैं। लेकिन अगर ये रंग न हों, तो क्या प्यार कम हो जाएगा?

सावित्री व्रत में लाल साड़ी पहनकर पति की लंबी उम्र के लिए व्रत करती थी। आज उनके पास जाने के लिए सफेद साड़ी पहनकर कार्तिक व्रत कर रही हूँ। प्यार के रंग में कोई फ़र्क नहीं। फ़र्क है तो सिर्फ पहनावे में। सुहागन के रूप में खुद को सजाकर उनकी प्रतीक्षा करती थी। आज तुलसी मैया के पास दीप जलाकर उनसे मिलने की मिन्नतें कर रही हूँ। कहीं तो एक झलक दिख जाए। समय ने रंग बदल दिया, लेकिन प्यार के रंग में कोई बदलाव नहीं। इस साल घर की लिपाई-पुताई भी नहीं होगी। तुलसी मैया को भी ऐसे ही रहना पड़ेगा। क्या करूँ?

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