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पापा, कभी तो कहिए… मुझे तुमसे प्यार है !

पने बेटे का हाथ थामे भावुक बुजुर्ग भारतीय पिता पिता का प्यार अक्सर शब्दों में नहीं, उनकी खामोशी और जीवन भर निभाई गई जिम्मेदारियों में छिपा होता है।
suresh parihar

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वायर न्यूज़, पुणे

बचपन में जब घुटने छिल जाते थे, तो मां की गोद सबसे सुरक्षित जगह लगती थी। वह चोट पर फूंक मारती, सीने से लगाती और कहती, “कुछ नहीं हुआ, मेरा बच्चा।” पिता पास खड़े होकर शायद इतना ही कहते, “लड़के होकर रोते हो? मजबूत बनो!”

बच्चा आंसू पोंछ लेता। वह समझता कि पापा के सामने रोना नहीं चाहिए। लेकिन उस दिन उसके भीतर एक छोटी-सी इच्छा जन्म लेती, जिसे वह शायद खुद भी ठीक से समझ नहीं पाता। काश! पापा भी एक बार उसे गले लगा लेते। उसके सिर पर हाथ फेरकर कहते, “डरो मत, मैं हूं न!”वक्त बीतता गया। घुटनों के घाव भर गए, बचपन पीछे छूट गया, लेकिन पिता के सामने अपनी भावनाएं छिपाने की आदत कहीं भीतर रह गई।

पिता के पास हर सवाल का जवाब था, बस प्यार के शब्द नहीं थे

स्कूल में अच्छे अंक आए, तो पिता ने कहा, “अब इससे भी बेहतर करना।” नौकरी मिली, तो बोले, “ईमानदारी से काम करना।” शादी हुई, तो समझाया, “अब जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं, सोच-समझकर चलना।”हर मोड़ पर पिता ने रास्ता दिखाया। गलतियों से बचाया। मुश्किलों के लिए तैयार किया। लेकिन इन तमाम सीखों के बीच बच्चा शायद उस एक वाक्य की प्रतीक्षा करता रहा, जो उसे बता सके कि वह केवल अपने काम, अपनी सफलता या अपनी जिम्मेदारियों के कारण नहीं, बल्कि अपने होने भर से पिता के लिए खास है। पिता ने कभी उसकी फीस के लिए अपनी जरूरतें टाली होंगी। उसकी पढ़ाई के लिए अतिरिक्त काम किया होगा। उसकी परेशानी में रातभर करवटें बदली होंगी। लेकिन क्या पिता ने कभी सोचा कि जिस बच्चे के भविष्य के लिए उन्होंने इतनी मेहनत की, वह उनके सामने आज भी अपने मन की बात कहने से क्यों डरता है? कभी-कभी प्रेम की कमी नहीं होती, उसे महसूस कराने वाले शब्दों की कमी होती है।
पिता की जेब में पैसे थे, दिल में हजार चिंताएं

पिता अक्सर अपनी थकान का हिसाब नहीं रखते। घर लौटते हैं, तो पूछते हैं कि सबने खाना खाया या नहीं। बिजली का बिल जमा हुआ या नहीं। बच्चे की परीक्षा कैसी चल रही है। बेटी सुरक्षित घर पहुंच गई या नहीं।वे परिवार की हर छोटी-बड़ी जरूरत याद रखते हैं, लेकिन अपनी जरूरतों के बारे में बोलना भूल जाते हैं। नई कमीज की जगह पुरानी कमीज पहन लेते हैं। अपने लिए कुछ खरीदने से पहले बच्चों की जरूरतें देखते हैं। कभी मन उदास होता है, तो चुपचाप छत पर चले जाते हैं या अखबार खोलकर बैठ जाते हैं। उनकी चुप्पी के पीछे क्या है, कोई पूछता भी नहीं। क्योंकि परिवार ने मान लिया है कि पापा मजबूत हैं। उन्हें किसी सहारे की जरूरत नहीं होती। लेकिन सच तो यह है कि पिता भी थकते हैं। उन्हें भी कभी किसी का हाथ अपने कंधे पर चाहिए होता है। वे भी चाहते हैं कि कोई उनसे पूछे, “पापा, आप ठीक हैं न?” फर्क सिर्फ इतना है कि उन्होंने जीवन भर दूसरों का सहारा बनना सीखा, अपना दर्द बताना नहीं।

बड़े होने के बाद भी हम पिता के सामने बच्चे ही रहते हैं

एक उम्र के बाद बेटा पिता की तरह कमाने लगता है। बेटी अपने घर-परिवार में व्यस्त हो जाती है। दोनों अपनी जिम्मेदारियां निभाते हुए समझने लगते हैं कि पिता ने जीवन में कितने समझौते किए होंगे।अब पिता की डांट में छिपी चिंता समझ आने लगती है। देर रात आने पर पूछे गए सवालों का अर्थ समझ में आता है। फोन पर बार-बार हालचाल पूछने के पीछे छिपा अकेलापन भी धीरे-धीरे दिखाई देने लगता है। लेकिन एक अजीब बात होती है। पिता को समझने की उम्र आते-आते उनसे खुलकर बात करने का समय कम पड़ने लगता है। कितनी बार मन करता है कि उनके पास बैठकर कहें, “पापा, आपने हमारे लिए बहुत कुछ किया। हम शायद कभी आपको बता नहीं पाए कि आप हमारे लिए कितने महत्वपूर्ण हैं।” लेकिन फिर कोई फोन आ जाता है, कोई काम याद आ जाता है और वह बातचीत अगले दिन पर टल जाती है। हम सोचते हैं, अभी तो बहुत समय है। कभी फुर्सत से बैठेंगे। कभी खुलकर बातें करेंगे। कभी उन्हें गले लगाकर कहेंगे कि हम उनसे कितना प्यार करते हैं। लेकिन समय किसी के लिए नहीं रुकता।
एक दिन पिता की खामोशी हमेशा के लिए रह सकती है
कल्पना कीजिए, एक दिन आप घर लौटें और पिता अपनी कुर्सी पर न बैठे हों। वह आवाज न आए, “आ गए? खाना खाया?” फोन पर वह परिचित सवाल सुनाई न दे, “कहां हो? कब तक आओगे?” तब शायद घर में सब कुछ वैसा ही हो, लेकिन घर जैसा कुछ न लगे। उनकी पुरानी कमीज, चश्मा, घड़ी और कुर्सी अचानक बहुत कीमती हो जाएं। उनकी डांट याद आए। छोटी-छोटी नसीहतें याद आएं। और उन तमाम बातों के बीच मन किसी एक अधूरे पल पर अटक जाए—काश, एक बार और उनके पास बैठ पाते। काश, एक बार और उनका हाथ पकड़ पाते। काश, एक बार उनसे कह पाते कि पापा, आपसे बहुत प्यार है। और शायद मन के किसी कोने में यह कसक भी उठे कि काश, उन्होंने भी एक बार कह दिया होता। इसलिए भावनाओं को कल पर मत टालिए। पिता से बात कीजिए। उनके पास बैठिए। उनकी पुरानी कहानियां सुनिए। कभी बिना किसी जरूरत के फोन कीजिए। उनके कंधे पर हाथ रखकर पूछिए कि वे कैसे हैं। और अगर वे अपनी भावनाएं व्यक्त करने में संकोच करें, तो उनकी खामोशी को बदलने की शुरुआत आप भी कर सकते हैं। क्योंकि हर पिता को प्रेम व्यक्त करना सहज नहीं लगता, लेकिन हर रिश्ते में प्रेम महसूस किए जाने का महत्व है। पापा, आपने हमें चलना सिखाया, गिरकर उठना सिखाया और दुनिया से लड़ना सिखाया। बस एक बात शायद हम दोनों ही नहीं सीख पाए—आपसे अपने मन की बात कहना और आपका अपने मन का प्यार शब्दों में जताना। अब जब भी मौका मिले, एक-दूसरे से कह दीजिए। क्योंकि जिंदगी की सबसे बड़ी अधूरी इच्छा कभी-कभी बहुत छोटी होती है। पापा, एक बार गले लगाकर कह दीजिए—“मुझे तुमसे बहुत प्यार है, बेटा!”

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