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प्यार का इंतज़ार

स्टेशन पर वर्षों के इंतजार के बाद पहली बार मिले राघव और रिद्धिमा राघव और रिद्धिमा की पहली मुलाकात.
suresh parihar editor

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वायर न्यूज़, पुणे

कहते हैं, कुछ लोग हमारी जिंदगी में देर से आते हैं, लेकिन उनका इंतजार शायद बहुत पहले से शुरू हो चुका होता है.

रिद्धिमा को अक्सर लगता था कि उसकी जिंदगी में कुछ अधूरा है. सब कुछ ठीक था. काम था, अपने लोग थे, दोस्तों के साथ हँसी-मजाक था. फिर भी रात को जब वह अकेली होती, तो मन में एक खालीपन-सा महसूस होता.

उम्र तीस के पार हो चुकी थी. रिश्ते आए. कुछ अच्छे भी लगे, लेकिन हर बार बात आगे बढ़ाने का मन नहीं हुआ.

वह खुद से ही पूछती, आखिर वह किसका इंतजार कर रही है?

कोई जवाब नहीं मिलता.

राघव की जिंदगी भी बहुत अलग नहीं थी. काम और जिम्मेदारियों में उसका समय निकल जाता था. घूमने-फिरने का शौक था, इसलिए जब भी मौका मिलता, किसी नए शहर की तरफ निकल जाता. लेकिन लौटकर वही रोजमर्रा की जिंदगी और वही खालीपन उसका इंतजार करता.

फिर दोनों की मुलाकात हुई.

पहली बातचीत बिल्कुल सामान्य थी. कोई खास बात नहीं हुई थी, लेकिन उसके बाद बातचीत रुकने का नाम नहीं ले रही थी.

पहले दिन कुछ देर बात हुई.

फिर अगले दिन.

फिर यह रोज का सिलसिला बन गया.

राघव को रिद्धिमा की आवाज सुनना अच्छा लगता था. रिद्धिमा को उसकी बातें.

कभी राघव अपने दिनभर की बातें बताता, कभी रिद्धिमा अपने मन की कोई छोटी-सी बात उससे साझा कर देती.

धीरे-धीरे दोनों एक-दूसरे की आदत बन गए.

कई बार फोन पर लंबी बातचीत के बाद भी दोनों फोन नहीं रखते थे. कोई कुछ नहीं बोलता, फिर भी फोन चलता रहता.

राघव पूछता—

“सो गई?”

रिद्धिमा कहती—

“नहीं.”

“फिर चुप क्यों हो?”

“बस ऐसे ही.”

“ठीक है, मैं भी ऐसे ही रहता हूँ.”

और दोनों हँस देते.

उनके बीच दूरी थी. मिलना आसान नहीं था. फिर भी दोनों ने कभी इस रिश्ते पर कोई दबाव नहीं बनाया.

काफी समय बाद एक रात रिद्धिमा ने अचानक पूछा—

“अगर मैं तुमसे कभी न मिलूँ तो?”

राघव कुछ देर चुप रहा.

फिर बोला—

“तो शायद मुझे हमेशा लगेगा कि जिंदगी में कुछ छूट गया.”

रिद्धिमा ने बात बदल दी, लेकिन वह जवाब उसके मन में रह गया.

कुछ दिनों बाद राघव ने फिर मिलने की बात की.

इस बार रिद्धिमा ने मना नहीं किया.

दिन तय हुआ.

जगह तय हुई.

राघव कोलकाता आने वाला था और शाम पाँच बजे स्टेशन पर दोनों की मुलाकात होनी थी.

मुलाकात वाले दिन रिद्धिमा काफी पहले स्टेशन पहुँच गई.

उसे खुद पर हँसी भी आ रही थी. आखिर वह इतनी घबराई हुई क्यों है?

वह बार-बार मोबाइल देखती. फिर सामने आती ट्रेन की तरफ देखने लगती.

ट्रेन आई.

लोग उतरने लगे.

रिद्धिमा की नजर हर चेहरे पर जाती और फिर लौट आती.

तभी एक परिचित-सा चेहरा दिखाई दिया.

राघव.

कंधे पर बैग था. सफर की थकान चेहरे पर साफ दिख रही थी.

दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे.

फोन पर अनगिनत बार सुनी आवाज सामने खड़ी थी.

राघव ने मुस्कुराकर कहा-

“रिद्धिमा?”

उसने भी मुस्कुराकर जवाब दिया—

“हाँ.”

“कैसी हो?”

“अभी तक तो ठीक हूँ.”

राघव हँस पड़ा.

“अभी तक क्यों?”

“पता नहीं. तुम्हें सामने देखकर समझ नहीं आ रहा क्या बोलूँ.”

“मुझे भी नहीं.”

दोनों कुछ देर चुप रहे.

फिर राघव ने कहा-

“तुम बिल्कुल वैसी ही हो, जैसी सोची थी.”

रिद्धिमा ने कहा-

“तुम भी.”

“सच?”

“हाँ.”

“अच्छा, तो इतने सालों का इंतजार बेकार नहीं गया.”

रिद्धिमा मुस्कुरा दी.

चलते-चलते राघव ने पूछा—

“अब भी डर लग रहा है?”

“थोड़ा.”

“किस बात का?”

“पता नहीं.”

राघव ने उसकी तरफ देखा.

“अब तो मिल गए.”

रिद्धिमा ने कुछ नहीं कहा.

उसके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान थी.

शाम धीरे-धीरे उतर रही थी. स्टेशन की भीड़ अपने रास्ते जा रही थी. दोनों वहीं खड़े थे, जैसे इतने वर्षों से चल रही उनकी बातचीत आज पहली बार आमने-सामने आकर पूरी हुई हो.

राघव ने जाते-जाते बस इतना कहा—

“अब फोन पर बात करने के लिए इंतजार नहीं करना पड़ेगा.”

रिद्धिमा ने उसकी तरफ देखकर कहा—

“लेकिन तुम्हें मिलने के लिए इंतजार तो करना पड़ेगा.”

“कितना?”

“पता नहीं.”

राघव मुस्कुराया.

“इतना तो कर ही लूँगा.”

रिद्धिमा भी मुस्कुरा दी.

शायद यही उनकी कहानी थी.

बहुत सारी बातें, बहुत सारी रातें और एक लंबा इंतजार.

इंतहा हो गई इंतजार की.

लेकिन इंतजार खत्म होने के बाद भी कहानी खत्म नहीं हुई थी.

असल कहानी तो अब शुरू हुई थी.

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