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सफ़र की यादें

सफ़र की यादें कविता में पुराने प्रेम को याद करती भावुक महिला कुछ आवाज़ें बीते हुए प्रेम और अधूरे अरमानों को फिर से जीवंत कर देती हैं।

प्रतिभा पांडेय “प्रति” चैन्नई

आह! बड़े दिनों बाद उसका फ़ोन आया,
बहुत वक़्त बाद तेरी चाहत का पैगाम आया!

भाव-विह्वल हो मैं तुम्हें सुन रही थी,
पुराने सपने नए तरीके से बुन रही थी!

मैं होकर भी नहीं थी फ़ोन पर,
मंत्रमुग्ध थी उसके टोन पर!

सदियों पीछे अपने को ढूँढ़ रही थी,
‘प्रतिभा’ नज़र आ रही थी,
पर अपरिचित-सी मुझे देख रही थी!

कसकर जकड़ रखा है उसने बाँहों में,
फूल ही फूल बिछे हैं राहों में!

ख़्वाहिशें पूरी करने की गुहार,
बार-बार प्यार का इज़हार!
मना न करना प्रिये, मेरी मनुहार!
हर राह को आसान बनाएँगे प्रिये,
किए थे जो वादे, निभाएँगे प्रिये!

मेरी मीठी शाम लौटाओ,
फिर से मेरी ज़िंदगी बन जाओ…!

पीछे से माँ, माँ की आवाज़ से ध्यान टूटा,
ध्यान के साथ अरमान टूटा…!

कहाँ गुमनाम थे अब तक,
तीर-समान सवाल था मेरा,
तुमने जवाब दिया, आत्मग्लानि से भरकर

जब तक पास था, तेरा एहसास नहीं कर पाया,
बाँहों में भरकर भी तुम्हें अपना नहीं पाया।
दूर होकर जाना, तुम मेरी बंदगी हो,
तुम्हीं मेरी सुकून-ए-ज़िंदगी हो…!

आवाज़ रुआँसी थी मेरी, पर बुलंद बोली

समय ने समय को समय पर समय न दिया,
फिर समय ने समय को रुख़सत कर दिया!

आह! आज भी वक़्त-बेवक़्त बहुत पीछे मुझे ले जाता है,
यादें, सफ़र की यादें खींचकर रुआँसी कर जाती हैं।

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