माँ के दो हाथों की टोकरी

कुछ आड़ी, कुछ तिरछी रेखाएँ,
भले न हों सटीक,
पर लगती हैं जैसे —
माँ के दो हाथों की टोकरी।

जिसमें सम्भाल कर रखा है एक जीवन,
जिसे वह पालती-दुलारती है…
जैसे केवल माँ ही कर सकती है।

तू छल-कपट सीख न पाई,
साल बीते, मैं बहुत बदली,
पर तुझमें देखी वही छवि —
उस छोटे-से गलती दोहराते बच्चे की,
जिसे हथेली पर रखा है।

रखूँ कैसे तुझे इस दुनिया के जंगल में?
चल उठ!
आ जा फिर हथेली में,
छुप जा आंचल में,
सो जा…

भूल जा अपनी दौड़-भाग,
क्योंकि इस जीवन-जंगल का खेल नहीं,
अंत है केवल — जंगल-आग।

विनिता गोविंदन, नई दिल्ली

3 thoughts on “माँ के दो हाथों की टोकरी

  1. कहानीकार ” कर्म की सीख ” बहुत सच्चाई पर आधारित है । बहुत से पण्डित/ ज्योतिषी इस पीढ़ी को कमज़ोर कर देते हैं , अपनी भविष्य वाणियों से जिनका आधार कुछ नहीं होता । उनके पास अधिक श्रेष्ठ कर्म का कोई ” उपाय ” नहीं है , पर ग्रहों की चाल बदलकर सब सुलभ कर सकते हैं …..आम लोगों को उनका निहित स्वार्थ देखना चाहिए।

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