डॉ. रीता दास राम की संवेदनशील हिंदी कविता, जो चुप्पी, विरोध, संवाद, सामाजिक विसंगतियों और बेहतर भविष्य की उम्मीद को शब्द देती है

डॉ. रीता दास राम, मुंबई, मुंबई
जब बहुत कुछ हद से ज्यादा
असहनीय होने लगे
तब बोलना जरूरी लगने लगता है
लगता है जैसे समय रुक रहा हो
जिसका चलते रहना वाजिब है
ठीक ऐसे समय
कलम ठहर कर पूछने लगती है
शब्द आंदोलन करते है
भाव उद्वेलित होते है
कुछ लिखा नहीं जाता साफ़ साफ
दर्द का एहसास भी कम पड़ता है
एक चीख भीतर से उठती है
पसरती चली जाती है चारों ओर
बोलने वालों की भाषा बदल जाती है
शब्दों में बात करते लोग
विस्फोटक लगने लगते हैं
कोई करता है विरोध जब
गूँज सुनाई देती है
चुप्पी ने सहमति का जामा
ना भी पहना हो
फिर भी सहमति दिखाई देती है
कभी कभी संवाद भी
आसानी से हल नहीं निकाल पाते
हद है के दुनिया देखती है
और सिर्फ़ देखती चली जाती है।
ऐसे में कुछ कर गुजरने की ख्वाहिश
अक्सर बेतरतीब हवाओं सी बहती
हालत से जा टकराती है
जहां वर्तमान की गुफ्तगू
भविष्य के मौन को जबरन हटाती है
अच्छा लगता है तब दृश्य का साफ़ होना
और नज़र आना एक बेहतर परिदृश्य का।

बहुत सुन्दर प्रस्तुति जैसे लगता है घायल और व्यथित मन को बहुत गहराई से जाना है, पहचाना है तब मन: स्थिति को उकेरा है। प्रत्येक शब्द दिल के गहराई तक छुआ है
हार्दिक धन्यवाद सुमनजी कविता को पढ़कर उसके मर्म को समझकर लिखी आपकी टिप्पणी के लिए 🌹🌹
हार्दिक धन्यवाद सुमनजी, आपने कविता को पढ़ा। पसंद किया और टिप्पणी की। 🌹🌹
रीता दास राम जी को पढ़कर हमें आज की को विडंबना को लेकर तल्ख सवाल करने की प्रेरणा मिलती है।
वाकई सबकुछ अनुचित घटते देखकर अवाम का खामोश रहने के लिए कवि का मन कचोटता है तो यह एकदम स्वाभाविक है। सामने सबकुछ सैलाब में बहते देखकर भी लोग चुप्पी साधे हुए हैं, यह तो बहुत खेदजनक है। साधुवाद।
रीता दास राम जी की कविताएं हमेशा विमर्शात्मक और उद्वेलित करती रही हैं। इस कविता में भी ……अभिव्यक्ति की व्याकुलता नजर आती है….जो प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त भी हुई हैं….