भीड़ के साथ चलने की मानसिकता पर सवाल

सीमा रॉय
इस विषय पर मैं कुछ लिखना नहीं चाहती थी, पर देख रही हूँ कि इनके विरोध में इतने स्वर उठ गए कि मुझे मजबूर होना पड़ा कि अपनी बात मैं भी रखूँ कि मैं कैसे सोचती हूँ इस विषय पर… पर पहले घटनाक्रम देखते हैं.
प्रेमानंद महाराज जी के एक शिष्य की आत्महत्या के बाद तरह-तरह की बातें सामने आ रही हैं. सोशल मीडिया पर कोई उनकी पीआर टीम को लेकर सवाल उठा रहा है, कोई विराट और अनुष्का को लेकर तरह-तरह के दावे कर रहा है. कुछ लोग उनके परिवार और बच्चों से जुड़े भी आरोप लगा रहे हैं. इनमें से कई बातें अप्रमाणित हैं और जब तक उनके विश्वसनीय प्रमाण सामने न आएँ, उन्हें तथ्य मानना उचित नहीं है.
दिलचस्प बात यह है कि कल तक प्रेमानंद महाराज जी पर कोई आरोप नहीं था, कोई कमी दिखाई नहीं देती थी. लोग नतमस्तक थे, ‘राधा-राधा’ गाते हुए झूम रहे थे. जिन न्यूज चैनलों ने कल तक विराट-अनुष्का के प्रेमानंद महाराज जी के दर्शन वाले वीडियो बार-बार दिखाकर खूब व्यूज बटोरे, वही आज इस घटना के बाद उनसे जुड़ी तरह-तरह की खबरें और दावे सामने ला रहे हैं. कौन-सी खबर तथ्य है और कौन-सी केवल अटकल या सनसनी, यह अलग-अलग करके देखना जरूरी है.
सवाल इस समय केवल प्रेमानंद महाराज जी के सही या गलत होने का नहीं है. सवाल हमारे विवेक का भी है.
असल में, शायद अधिसंख्य लोगों का विवेक मर चुका है. जिस तरफ भीड़ दिखाई देती है, लोग उसी तरफ चल पड़ते हैं. कल तक प्रेमानंद महाराज जी में उन्हें सरलता, ज्ञान और संतत्व दिखाई देता था; आज वही व्यक्ति कुछ लोगों को कुटिल और बनावटी नजर आने लगा है.
क्या किसी व्यक्ति के प्रति हमारी धारणा इतनी आसानी से बदल जानी चाहिए?
किसी घटना के बाद प्रश्न उठाना गलत नहीं है. सवाल पूछे जाने चाहिए, तथ्यों की जाँच होनी चाहिए और यदि किसी पर कोई वास्तविक आरोप है तो उसकी निष्पक्ष जाँच भी होनी चाहिए. लेकिन सिर्फ सोशल मीडिया पर चल रहे दावों और आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी ठहरा देना भीड़ की मानसिकता ही है.
कहते हैं, गुरु का चुनाव बहुत सोच-समझकर करना चाहिए. क्योंकि गुरु केवल वह नहीं जो हमें मंत्र दे दे; गुरु वह है जो हमें अपने भीतर झाँकना, विवेक से निर्णय लेना और जीवन के उतार-चढ़ाव में स्वयं खड़े रहना सिखाए. सही गुरु भवसागर पार कराए या न कराए, कम-से-कम जीवन के रास्ते पर आँखें खोलकर चलना तो सिखा ही सकता है.
इन वर्षों में मैं एक और अजीब प्रवृत्ति देख रही हूँ—तथाकथित भक्तों की भीड़ अपने स्वार्थ, विश्वास और सुविधा के अनुसार नए देवी-देवता और साधु-संत चुनती है, उन्हें सिर पर बिठाती है और फिर परिस्थितियाँ बदलते ही उसी भीड़ के साथ उन्हें नीचे पटक देती है.
बीते कुछ वर्षों में नीम करौली बाबा, बालाजी महाराज, खाटू श्याम बाबा, प्रेमानंद महाराज जी जैसे अनेक नामों के पीछे लोगों की भीड़ उमड़ी है. कैंची धाम में भी अथाह भीड़ दिखाई देती है, जबकि नीम करौली बाबा इस संसार में नहीं हैं.
आस्था बुरी चीज नहीं है.
लेकिन आस्था जब विवेक को निगल जाए, तब वह अंधानुकरण बन जाती है.
प्रकृति ने मनुष्य को बुद्धि इसलिए दी है कि वह अपना हित-अहित पहचान सके, प्रश्न कर सके, निर्णय ले सके और सही-गलत के बीच अंतर कर सके. लेकिन हमने अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करने के बजाय भीड़ की भेड़चाल को ही अपना विश्वास बना लिया है.
और जब कभी हमारा विश्वास टूटता है, तो हम अपने निर्णय पर प्रश्न उठाने के बजाय उसी व्यक्ति को गालियाँ देने लगते हैं, जिसे कल तक भगवान से कम नहीं मान रहे थे.
शायद ऐसे समय में दूसरों पर उँगली उठाने से पहले हमें अपने आप से एक सवाल पूछना चाहिए—
जिसे कल तक मैंने बिना सोचे-समझे अपना आदर्श बनाया था, क्या उसके चुनाव में मेरी भी कोई जिम्मेदारी थी?
अगर जवाब ‘हाँ’ है, तो दूसरों को गालियाँ देने से पहले शायद हमें खुद को दो-चार थप्पड़ लगाने चाहिए.
क्योंकि भीड़ गलत हो सकती है.
समाचार गलत हो सकते हैं.
धारणाएँ गलत हो सकती हैं.
अप्रमाणित आरोप भी गलत हो सकते हैं.
लेकिन अपना विवेक छोड़ देना—यह गलती हमारी अपनी होती है.
थोड़ा सोचना मित्रों.

बढ़िया लिखा, भीड़ की भेंड़चाल के साथ चलने की जगह विवेक का इस्तेमाल करे। अंधानुकरण करना घातक है। ढोंगी बाबाओ का अनुकरण करने से पूर्व अपनी बुद्धि का प्रयोग करे।