पिता : बिना दुनिया अधूरी
पिता केवल परिवार का आधार नहीं, बल्कि वह मौन शक्ति हैं जो अपने सपनों से पहले बच्चों की खुशियों को चुनते हैं। यह कविता पिता के प्रेम, त्याग और अपनत्व को समर्पित है।

पिता केवल परिवार का आधार नहीं, बल्कि वह मौन शक्ति हैं जो अपने सपनों से पहले बच्चों की खुशियों को चुनते हैं। यह कविता पिता के प्रेम, त्याग और अपनत्व को समर्पित है।
“अरे काकी, तुम्हें नहीं मालूम क्या? बंसी का बेटा कलेक्टर बन गया है…” संध्या की बात सुनते ही जानकी काकी की आँखों में चमक आ गई। दिन-रात ऑटो चलाकर बेटे को पढ़ाने वाले बंसी की तपस्या आज रंग लाई थी। जब मीडिया ने बेटे से उसकी सफलता का श्रेय पूछा, तो उसने बिना झिझक कहा—“मेरे बाउजी… क्योंकि फल की पहचान हमेशा पेड़ से ही होती है।” यह सुनकर बंसी की आँखों से आँसू बह निकले, और आसपास खड़ी भीड़ तालियों से गूंज उठी। यह सिर्फ एक सफलता की कहानी नहीं, बल्कि उस संघर्ष, त्याग और प्रेम का प्रमाण है, जो एक पिता अपने बच्चे के लिए जीता है।
एक पिता जिसने बच्चों के लिए अपनी जिंदगी कुर्बान कर दी, वही बुढ़ापे में भावनात्मक उपेक्षा का शिकार हो जाता है। “रोटी की दास्तान” रिश्तों की सच्चाई को बेहद मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती है।