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नियति से बहस नहीं

शैफाली सिन्हा, नवी मुंबई (महाराष्ट्र) बचपन से ही मैंनेख़ुद को पीछे रखकरसबकी सेवा की।लोग आश्वासन देते रहेइसका फल ज़रूर मिलेगा। फल की कभी चाह नहीं रही,बस कोई स्नेह सेदो मीठे बोल कह देतो वही मेरी सबसे बड़ी पूँजी बन जाते। शायद यही मेरी नियति थी,या शायद मेरा होना हीकिसी और का सहारा बनने के लिए…

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गलतफहमियांँ

गलतफहमियांँ… एक ऐसी आग जो बिना लगाए ही सब कुछ भस्म कर देती है। रिश्ते, अहसास, अरमान — सब इसकी चक्की में पिस जाते हैं। अपनों को अपनों से दूर करने वाली यही गलतफहमियांँ, जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी बन जाती हैं।

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