ठहर न सका वो प्रेम

डॉ. तारा गुप्ता, प्रसिद्ध लेखिका, गाजियाबाद

नशा सुबह चढा ही था वो शाम तक उतर गया
न जाने कैसा प्रेम था चला नहीं, ठहर गया.

उसे भी तो तलाश थी मुझे भी कुछ तलाश थी
वो सामने खड़ा तो था न जाने फिर किधर गया.

बची न फिर तलब कोई बची न बेकरारियां
यूं फालतू से पर मेरे इक पल में ही कुतर गया.

पता नहीं किधर गया इधर गया _उधर गया
फकीर था बड़ा कोई जो मन मेरा संवर गया.

मिली नई झलक कोई , जो आज तक लुभा रही
अजीब शख्स था ,मगर वो रूह में पसर गया.

6 thoughts on “ठहर न सका वो प्रेम

    1. आदरणीय साथियों मुझे इस बात की खुशी है कि आप सभी लोग एक-दूसरे की रचनाओं को पढ़ते हैं और अपनी राय व्यक्त करते हैं. इसी तरह से वरिष्ठ साथी, नवोदित रचनाकारों को प्रोत्साहित करते रहें और समय-समय पर मार्गदर्शन करते रहें. आप अपनी रचनाएं नियमित रूप से भेज कर सहयोग करते रहें.
      सुरेश परिहार, लाइव वॉयर न्यूज

  1. दिल से शुक्रिया आप सभी का /
    मित्रों हिंदी साहित्य की सेवा के अनेकों प्रारूप हैं
    उसमें से एक प्रारूप यह भी है कि साहित्यकारों को आभासी दुनिया में प्रकाशित करना /
    मुझे प्रकाशित करने के लिए इस वेबसाइट का आभार व्यक्त करती हूं /
    डॉक्टर तारा गुप्ता
    गाजियाबाद

    1. आदरणीय साथियों मुझे इस बात की खुशी है कि आप सभी लोग एक-दूसरे की रचनाओं को पढ़ते हैं और अपनी राय व्यक्त करते हैं. इसी तरह से वरिष्ठ साथी, नवोदित रचनाकारों को प्रोत्साहित करते रहें और समय-समय पर मार्गदर्शन करते रहें. आप अपनी रचनाएं नियमित रूप से भेज कर सहयोग करते रहें.
      सुरेश परिहार, लाइव वॉयर न्यूज

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *