ठहर न सका वो प्रेम

सुबह का नशा धीरे-धीरे चढ़ा तो था, लेकिन शाम तक उतर गया। यह प्रेम भी कुछ वैसा ही था—जिसे टिकना चाहिए था, पर ठहर न सका। अजीब बात यह रही कि उसे भी तलाश थी और मुझे भी, लेकिन जब वह सामने खड़ा था, तब भी पता नहीं क्यों वह न जाने कहाँ गुम हो गया।

इसके बाद न कोई तलब बची, न कोई बेक़रारी। सब कुछ जैसे अचानक खत्म हो गया और मेरे भीतर की बेचैनियों को किसी ने एक ही पल में कुतर डाला। मुझे याद है, शायद वह कोई फकीर ही रहा होगा, जिसकी उपस्थिति ने मेरे मन को इस कदर सँवार दिया कि सब कुछ बदल गया।

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