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शायद ये इत्तेफ़ाक ही था…

एक संयोग-भरी ट्रेन यात्रा में सामने बैठी एक सभ्रांत, गुमसुम महिला ने लेखक की आत्मा को अनकहे शब्दों से छू लिया। उसकी उदास आँखों में जैसे कई अनलिखी कहानियाँ थीं, और उसकी खामोश मुस्कान में छिपे इंद्रधनुषी रंग बार-बार पुकारते थे। दो मुसाफ़िर कुछ पल साथ, फिर अपने-अपने स्टेशनों की ओर। समय बीत गया, उम्र बढ़ी, लेकिन उस अनाम उदासी भरे चेहरे की याद दिल की तहों में आज भी महफ़ूज़ है।

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पुनर्जन्म…

बस से मसूरी की यात्रा पर निकली साक्षी अपने परिवार के साथ मंदिर पहुँचती है। जैसे ही वह मंदिर के अहाते में कदम रखती है, एक बूढ़ा व्यक्ति उसे देखकर दौड़ा चला आता है और कहता है — “बिटिया, तू आ गई! मैं तेरा इंतज़ार कर रहा था।”
सब हैरान रह जाते हैं। बूढ़ा एक पुरानी तस्वीर दिखाता है . उसमें साक्षी जैसी ही एक लड़की थी, नाम लिखा था “नूरी”। बूढ़े की आँखों में आँसू हैं, और साक्षी के मन में एक अनजाना कंपन।
क्या यह महज़ संयोग है, या सचमुच किसी पुनर्जन्म की कहानी शुरू हो चुकी है?

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ठहर न सका वो प्रेम

सुबह का नशा धीरे-धीरे चढ़ा तो था, लेकिन शाम तक उतर गया। यह प्रेम भी कुछ वैसा ही था—जिसे टिकना चाहिए था, पर ठहर न सका। अजीब बात यह रही कि उसे भी तलाश थी और मुझे भी, लेकिन जब वह सामने खड़ा था, तब भी पता नहीं क्यों वह न जाने कहाँ गुम हो गया।

इसके बाद न कोई तलब बची, न कोई बेक़रारी। सब कुछ जैसे अचानक खत्म हो गया और मेरे भीतर की बेचैनियों को किसी ने एक ही पल में कुतर डाला। मुझे याद है, शायद वह कोई फकीर ही रहा होगा, जिसकी उपस्थिति ने मेरे मन को इस कदर सँवार दिया कि सब कुछ बदल गया।

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कभी तुम्हारा कभी हमारा

ज़िंदगी कभी हमें सहारा देती है, कभी हम दूसरों के लिए सहारा बन जाते हैं। हालात चाहे जैसे हों, अमीर हो या ग़रीब, सबको तमीज़ से पेश आना होता है। भूख-प्यास, सुख-दुःख, किनारा या तूफ़ान — ये सब कभी तुम्हारे हिस्से आते हैं, कभी हमारे। यही जीवन का सच है कि नज़ारा बदलता रहता है और हर किसी की बारी आती है।”

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