Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers

ख़्वाहिशों के न फिर महल होंगे

मधु झुनझुनवाला ‘अमृता‘ प्रसिद्ध साहित्यकार, जयपुर (राजस्थान) मुंतज़िर थे हमीं न कल होंगे ।ये लम्हे क्या कभी अज़ल होंगे । फ़िक्र अब है कहाँ मुहब्बत में,ज़ीस्त में क्यों सनम दख़ल होंगे । दिल बुझेंगे कभी जो फुर्कत में,ख़्वाहिशों के न फिर महल होंगे । बाद मेरे इन्हीं निगाहों में ,अश्क़ में तर हसीं कँवल होंगे…

Read More

ठहर न सका वो प्रेम

सुबह का नशा धीरे-धीरे चढ़ा तो था, लेकिन शाम तक उतर गया। यह प्रेम भी कुछ वैसा ही था—जिसे टिकना चाहिए था, पर ठहर न सका। अजीब बात यह रही कि उसे भी तलाश थी और मुझे भी, लेकिन जब वह सामने खड़ा था, तब भी पता नहीं क्यों वह न जाने कहाँ गुम हो गया।

इसके बाद न कोई तलब बची, न कोई बेक़रारी। सब कुछ जैसे अचानक खत्म हो गया और मेरे भीतर की बेचैनियों को किसी ने एक ही पल में कुतर डाला। मुझे याद है, शायद वह कोई फकीर ही रहा होगा, जिसकी उपस्थिति ने मेरे मन को इस कदर सँवार दिया कि सब कुछ बदल गया।

Read More

तुम्हारे बाद भी, तुम्हारी निशानियाँ

तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारी हर छोड़ी हुई चीज़—कपड़े, प्याली, तौलिया—मुझे तुम्हारी याद दिलाती है। तुम बिखेरते जाते हो और मैं उन्हें जतन से सहेजती जाती हूँ, क्योंकि इन्हीं में हमारा रिश्ता साँस लेता है।”

Read More

प्रेम शाप है….

यहाँ प्रेम को शाप के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो नाश और विरक्ति के साथ-साथ एक अमरता का भाव भी लिए है। शहरों का विकास प्रकृति को निगल गया, परंतु शापित खंडहर अब भी अछूते हैं—मानो प्रेम भी उसी तरह समय और विनाश से परे जीवित रहता है। सूखी नदियाँ, वीरान इमारतें और तप्त अधर—ये सभी स्मृतियों और अधूरेपन के प्रतीक हैं। वक्ता मानो किसी पूर्वजन्म की स्मृति से बंधा हुआ है, और प्रेम को “सांकेतिक मरीचिका” कहकर उसकी अस्थिरता और मृगतृष्णा-सी प्रकृति को सामने लाता है।

Read More

आजन्म बिछोह

इस बार की यात्रा वैसी नहीं थी जैसी पहले हुआ करती थी। न तस्वीरें देखीं, न डायरी लिखी — मन एक अजीब उचाट, थका और शून्य में डूबा हुआ है। जूड़े के फूलों के बीच अब एक जोड़ी उदास आँखें महसूस होती हैं, जो स्मृतियों की तरह टंगी रह गई हैं। हर बार की तरह यह यात्रा आनंद नहीं, बल्कि एक सैलाब छोड़ गई — भावनाओं का, बिछोह का, और उस प्रेम का जो चुपचाप आता है और सब बहा ले जाता है। इस बार आषाढ़ केवल मौसम नहीं, एक डूबती आत्मा का रूप बन गया है। न प्रतीक्षा है, न वचन, न कोई सहारा — बस एक अंतहीन दूरी, जहाँ अगली मुलाकात की कोई संभावना नहीं। इस प्रेम की परिणति नहीं, केवल आजन्म बिछोह ही लिखा है।

Read More