
पूनम सिंह “वत्सला” जमशेदपुर
लोरी मधुर सुनाती माँ,
देकर थाप सुलाती माँ।
हाथ फेरती सर पर जब,
कुछ भी करे, सुहाती माँ।
कभी पुकारो, आती माँ,
बोलो, किसे न भाती माँ।
भोजन कर लिया सभी ने,
बचा-खुचा ही खाती माँ।
क्या है अपना, कहती माँ,
सर्दी-गर्मी सब सहती माँ।
सुरभित करती हर क्षण को,
कम में भी शुभ रहती माँ।
होगी छोटी कद में माँ,
सबसे ऊँची पद में माँ।
पढ़े-लिखे सब नतमस्तक,
अनहद होकर हद में माँ।
यदा-कदा ही आहत माँ,
सदा सभी को राहत माँ।
जुटती सबके कारज में,
सबसे रखती चाहत माँ।
कब सोती, कब जागती माँ,
लीन उसी में लगती माँ।
तीनों लोक में बात यही बस,
निज को ही ठगती माँ।
दामन-छाया ढोती माँ,
नित गीले में सोती माँ।
बच्चों की जगती माँ,
माँ तो सच में होती माँ।
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