
डॉ. अनामिका दुबे निधि, प्रसिद्ध लेखिका, मुंबई
मैं अल्हड़-सी इक लड़की हूँ, अल्हड़ता ही लिखती हूँ,
दिल में चाहे दर्द रहे, फिर भी मैं हँसती दिखती हूँ।
चेहरे पर मुस्कान लिए, ग़म को दिल में रखती हूँ,
रातों की तन्हाई में मैं, चुपके-चुपके जलती दिखती हूँ।
आँखों में ख़्वाबों की चमक, होठों पे मीठी बातें हैं,
टूटे दिल की हर धड़कन में, धीरे-धीरे ढलती दिखती हूँ।
महफ़िल में सब संग हँसती, सबसे बातें करती हूँ,
अपने ही अंदर के सन्नाटे में, लेकिन मैं सिमटती दिखती हूँ।
नींदों ने दामन छोड़ दिया, ख़्वाबों ने फिर थाम लिया,
सपनों की उस दुनिया में मैं, हर रात टहलती दिखती हूँ।
अश्कों को मोती मान लिया, पलकों में सजा कर रखती,
गिरने से पहले हर आँसू में, चुपचाप ही थमती दिखती हूँ।
रिश्तों की इस भीड़-भरी राहों में खुद को ढूँढती,
अपनों के बीच खड़ी होकर, सबसे ही अलग-सी दिखती हूँ।
हौसलों की लौ थामे मैं, आँधियों से लड़ती रहती,
टूटूँ चाहे सौ दफ़ा मैं, फिर भी संभलती दिखती हूँ।
चंचलता मेरी पहचान, सबको ये भाती है लेकिन,
इस हँसती-सी सूरत के पीछे, हर पल ही बिखरती दिखती हूँ।
‘निधि’, तेरे अल्फ़ाज़ों में ही तेरी सारी दुनिया है,
जितना खुद को लिखती जाती, उतनी सँवरती दिखती हूँ।
ये रचनाएं भी पढ़ें और अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें-
इश्क़: पहली सांस भी, आख़िरी भी
पल-पल जीवन
विंध्यवासिनी माता
राज़-ए-ज़िंदगी
खुद पर भरोसा रख

बहुत प्यारी अभिव्यक्ति 👌
शानदार
Bahut Sundar Abhivyakti