मस्‍त हवा का इक झौंका

वृद्धाश्रम में खिड़की के पास बैठी एक बुजुर्ग भारतीय माँ, हाथ में बेटे की फोटो, आंखों में इंतज़ार और दर्द वो आज भी इंतज़ार करती है…

डॉ. शशिकला पटेल असिस्‍टेंट प्रोफेसर , मुंबई

मस्‍त हवा का इक झौंका मन को सहला जाता है,
जब पास तू मेरे आता है, जब पास तू मेरे आता है।
कितने बरस बीत गए, एक बार तो आजा लाल मेरे,
यूं तो मैं चल लेती हूँ, थोड़ा काँधों को सँभाल मेरे।
मैं तुझको रोकूँगी नहीं, न पूछूँगी क्यों ये किया,
जानती हूँ घर में भी तेरा, निर्णय भी कहाँ चल पाता है।
मस्‍त हवा का इक झौंका…

कई बार लड़ गई थी मैं, तेरे पालन-पोषण की खातिर,
जिद पर अड़ गई थी मैं, तेरा भविष्य सँवारन की खातिर।
नाख़ुश कर डाला सास-ससुर को, पति को भी इग्नोर किया,
देखूँ बीबी के आगे, तू इतना साहस कर पाता है।
मस्‍त हवा का इक झौंका…

जब से दूर हुआ तू मुझसे, याद में पल-पल रोती हूँ,
तेरे साथ गुज़ारे हर क्षण यादों में पिरोती हूँ।
दिल को समझाया कई बार मगर, नादान समझ न पाता है,
मन गोते खाने लगता है, जब तू “माँ” कहकर बुलाता है।
मस्‍त हवा का इक झौंका…

अंतिम साँस की घड़ी है आई, एक बार बुला ले माँ मुझको,
तेरे दिये हर हाल में खुश हूँ, कोई गिला न दूँगी तुझको।
वृद्धाआश्रम जन्नत बन जाता, एक बार अगर तू आता,
अपना कर्तव्य निभाया मैंने, क्या तू भी फ़र्ज निभाता है।
मस्‍त हवा का इक झौंका….
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