मैं अल्हड़-सी लड़की
वह खुद को अल्हड़ कहती है- हँसती, खिलखिलाती, सबके बीच सहज दिखती हुई। मगर इस सहजता के पीछे एक शांत, गहरा सन्नाटा है, जहाँ उसके अधूरे ख़्वाब और अनकहे दर्द पलते हैं। वह अपने आँसुओं को पलकों में सजा कर रखती है, ताकि दुनिया उसकी मुस्कान ही देखे। रिश्तों की भीड़ में भी वह खुद को खोजती रहती है, हर बार टूटकर फिर संभल जाती है। उसकी कहानी शोर नहीं करती बस धीमे-धीमे महसूस होती है, जैसे रात की तन्हाई में कोई ख़ामोश उजाला।
