मासूम सपने

अष्टमी के दिन गिन्नी और सक्षम को खेलने का मौका मिला। गिन्नी की विधवा माँ चाची की मदद में व्यस्त थीं, इसलिए बच्चों को थोड़ी आज़ादी मिली। सक्षम बड़े मासूम अंदाज़ में गिन्नी से पूछता है कि वह रोज उसके साथ क्यों नहीं खेलती। गिन्नी बताती है कि उसे पढ़ाई करनी है, क्योंकि माँ कहती हैं कि लड़कियाँ ज्यादा नहीं पढ़तीं, उन्हें घर के कामों के लिए तैयार रहना चाहिए।

सक्षम चाहता है कि वह भी अपने पापा को ढूँढे और घर वापस लाए, लेकिन गिन्नी उसे समझाती है कि ऊपर आकाश में सब लोग गुम हो जाते हैं। दोनों भाई-बहन अपने छोटे-छोटे सपनों और मासूम बातचीत में उलझे हुए हैं। चाची की चीखती आवाज उन्हें जगाती है, और गिन्नी की आँखों में चमकते सपने कुछ पल में बिखर जाते हैं। यह कहानी बच्चों की मासूमियत और उनके भीतर की संवेदनशीलता को दर्शाती है।

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मुंबई में फिल्म राइटर के रूप में काम करती श्वेता बोथरा की प्रेरणादायक कहानी

शाबाश… श्वेता

उज्जैन के छोटे कस्बे महिदपुर रोड से आई श्वेता बोथरा ने हौसले, दृढ़ निश्चय और लगन से बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाई। महेश भट्ट और अनु मलिक के साथ डेब्यू कर उन्होंने साबित कर दिया कि असंभव कुछ भी नहीं। शिक्षा पूरी करने और मीडिया मैनेजमेंट में एमबीए के बाद श्वेता ने ओरकॉम एडवरटाइजिंग, इंदौर से करियर शुरू किया, लेकिन लेखन का जुनून उन्हें मुंबई ले गया।

उनकी लिखी फिल्म “तू मेरी पूरी कहानी” एक ऐसी लड़की की कहानी है, जिसे प्यार और करियर के बीच कठिन निर्णय लेना होता है। श्वेता की कहानी हज़ारों लड़कियों और युवा महिलाओं के लिए प्रेरणा है—सपने देखने और उन्हें पूरा करने के लिए हौसला, मेहनत और जुनून ही सबसे बड़ा हथियार हैं।

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नीयत अच्छी हो तो मजहब दीवार नहीं बनता

वो दिन आज भी स्मृति में ताजे हैं, जब बिहार के छपरा शहर में हिन्दू-मुस्लिम दंगे भड़क उठे थे. चारों ओर डर का माहौल था, एक अनजानी आशंका हर घर के आंगन में सन्नाटा बनकर पसरी हुई थी. उन्हीं कठिन दिनों में, हमारे घर में एक गरीब मुस्लिम लड़का भी रहता था, जो गांव से पढ़ाई के लिए भेजा गया था.
उसे पापा के किसी पुराने मित्र ने यह कहकर भेजा था कि बेटा पढ़ाई में बहुत तेज़ है, लेकिन हालात ठीक नहीं हैं्. आपने बहुतों की मदद की है, आज इसे भी आपके सहारे की ज़रूरत है.

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इंदौरियत जिंदा है…..

इंदौर ने स्वच्छता में लगातार आठवीं बार पहला स्थान पाकर यह सिद्ध कर दिया है कि जब नागरिक जागरूक हो जाएं तो कोई लक्ष्य असंभव नहीं। जहां देश के कई शहरों में सफाईकर्मियों के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएं सामने आ रही हैं, वहीं इंदौर में उन्हें हार पहनाकर सम्मानित किया जा रहा है। यह सिर्फ स्वच्छता की जीत नहीं, बल्कि मानवता और संवेदनशीलता की जीत है। इंदौर ने साबित किया है कि शहर की खूबसूरती केवल सड़कें नहीं, बल्कि वहां के लोगों का दिल भी होता है।

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नज़रिया…!

अगर हमारी सोच सकारात्मक और निर्मल है तो हम साधारण को भी असाधारण बना सकते हैं। परंतु यदि हम नकारात्मकता और पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं तो अच्छे से अच्छे में भी खोट ढूंढ़ लेंगे। प्रस्तुत लघुकथा एक सरल उदाहरण के माध्यम से यही संदेश देती है कि कई बार दोष न सामने वाले का होता है, न परिस्थिति का, बल्कि हमारी अपनी “नज़र” का होता है — जिसे बदलकर ही हम दुनिया को सही रूप में देख सकते हैं। जब तक हम अपनी खिड़की के शीशे साफ नहीं करते, हर दृश्य धुंधला और दोषपूर्ण ही नज़र आएगा।

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“जहां से मैं शुरू हुई, वहां मैं नहीं रुकी”

प्रभा ने जीवन भर त्याग और समर्पण सीखा, लेकिन जब अपनी बेटी की बातों ने उसे आईना दिखाया, तो उसने खुद के अस्तित्व की तलाश शुरू की। आज, वह सिर्फ किसी की पत्नी या बहू नहीं, बल्कि एक शिक्षिका, एक मार्गदर्शक और एक सफल स्त्री है — अपनी पहचान के साथ।”

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जो टूटी नहीं.. वो राशि थी

राशि अब भी रोज़ लड़ती है—कभी खुद से, कभी हालातों से, और कभी रिश्तों की खामोश दीवारों से। पर अब उसकी लड़ाई किसी को मनाने की नहीं, खुद को साबित करने की भी नहीं… अब उसकी लड़ाई खुद को खोने से बचाने की है।

उस दिन जब वो मंच पर खड़ी थी, साड़ी के पल्लू में कॉर्पोरेट पहचान और आंखों में एक मां की नमी समेटे—तब शायद पहली बार उसने खुद को पूरा महसूस किया।

जिसने कभी सपने पूरे करने के लिए किसी का सहारा नहीं माँगा, आज वो अपने संघर्ष की इमारत में अपनी बेटी के लिए खिड़कियाँ बना रही थी—जहाँ से आर्या रोशनी देख सके, आज़ादी की हवा महसूस कर सके। राशि जान चुकी थी—”परफेक्ट” दिखना ज़रूरी नहीं, खुद को समझना, स्वीकारना और थामे रखना उससे कहीं ज़्यादा बड़ा काम होता है।

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सिंगल मदर अपनी बेटी को पढ़ाते हुए, संघर्ष और प्यार का भावुक दृश्य

माँ की तपस्या, बेटी की उड़ान

“एक माँ ने अपने सारे सपनों को चुपचाप समेटकर अपनी बेटी के भविष्य के नीचे रख दिया. कभी उसने खुद को डॉक्टर के रूप में देखा था, लेकिन हालात ने उसे उस मोड़ पर ला खड़ा किया जहाँ उसे अपने अरमानों से ज्यादा अपनी बेटी के सपनों को चुनना पड़ा. उसने बिना किसी सहारे, बिना किसी शिकायत के हर मुश्किल को अपनाया और हर दिन सिर्फ एक ही लक्ष्य के साथ जीती रही अपनी बेटी को उड़ान देना.

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