नज़रिया…!

अगर हमारी सोच सकारात्मक और निर्मल है तो हम साधारण को भी असाधारण बना सकते हैं। परंतु यदि हम नकारात्मकता और पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं तो अच्छे से अच्छे में भी खोट ढूंढ़ लेंगे। प्रस्तुत लघुकथा एक सरल उदाहरण के माध्यम से यही संदेश देती है कि कई बार दोष न सामने वाले का होता है, न परिस्थिति का, बल्कि हमारी अपनी “नज़र” का होता है — जिसे बदलकर ही हम दुनिया को सही रूप में देख सकते हैं। जब तक हम अपनी खिड़की के शीशे साफ नहीं करते, हर दृश्य धुंधला और दोषपूर्ण ही नज़र आएगा।

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“जहां से मैं शुरू हुई, वहां मैं नहीं रुकी”

प्रभा ने जीवन भर त्याग और समर्पण सीखा, लेकिन जब अपनी बेटी की बातों ने उसे आईना दिखाया, तो उसने खुद के अस्तित्व की तलाश शुरू की। आज, वह सिर्फ किसी की पत्नी या बहू नहीं, बल्कि एक शिक्षिका, एक मार्गदर्शक और एक सफल स्त्री है — अपनी पहचान के साथ।”

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जो टूटी नहीं.. वो राशि थी

राशि अब भी रोज़ लड़ती है—कभी खुद से, कभी हालातों से, और कभी रिश्तों की खामोश दीवारों से। पर अब उसकी लड़ाई किसी को मनाने की नहीं, खुद को साबित करने की भी नहीं… अब उसकी लड़ाई खुद को खोने से बचाने की है।

उस दिन जब वो मंच पर खड़ी थी, साड़ी के पल्लू में कॉर्पोरेट पहचान और आंखों में एक मां की नमी समेटे—तब शायद पहली बार उसने खुद को पूरा महसूस किया।

जिसने कभी सपने पूरे करने के लिए किसी का सहारा नहीं माँगा, आज वो अपने संघर्ष की इमारत में अपनी बेटी के लिए खिड़कियाँ बना रही थी—जहाँ से आर्या रोशनी देख सके, आज़ादी की हवा महसूस कर सके। राशि जान चुकी थी—”परफेक्ट” दिखना ज़रूरी नहीं, खुद को समझना, स्वीकारना और थामे रखना उससे कहीं ज़्यादा बड़ा काम होता है।

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सिंगल मदर अपनी बेटी को पढ़ाते हुए, संघर्ष और प्यार का भावुक दृश्य

माँ की तपस्या, बेटी की उड़ान

“एक माँ ने अपने सारे सपनों को चुपचाप समेटकर अपनी बेटी के भविष्य के नीचे रख दिया. कभी उसने खुद को डॉक्टर के रूप में देखा था, लेकिन हालात ने उसे उस मोड़ पर ला खड़ा किया जहाँ उसे अपने अरमानों से ज्यादा अपनी बेटी के सपनों को चुनना पड़ा. उसने बिना किसी सहारे, बिना किसी शिकायत के हर मुश्किल को अपनाया और हर दिन सिर्फ एक ही लक्ष्य के साथ जीती रही अपनी बेटी को उड़ान देना.

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