पुराना बरगद का पेड़
रिक्त लटका झूला सावन में,
पुराने बरगद के पेड़ में,
ताक रहा है राह को —
ना जाने कब आएंगी बेटियाँ।
पूछ रहा है वो पुराना बरगद का पेड़ —
अब सावन में क्यों नहीं आतीं हैं बेटियाँ?

रिक्त लटका झूला सावन में,
पुराने बरगद के पेड़ में,
ताक रहा है राह को —
ना जाने कब आएंगी बेटियाँ।
पूछ रहा है वो पुराना बरगद का पेड़ —
अब सावन में क्यों नहीं आतीं हैं बेटियाँ?
ओशो के डिस्कोर्स से औरत सेक्स में बहुत अधिक रुचि नहीं रखती। वह गर्माहट, गले लगाने, मित्रता और प्रेम में ज़्यादा रुचि रखती है। पुरुष अधिकतर सेक्स में रुचि रखते हैं। ये गलतफहमियाँ इस बात को दर्शाती हैं कि शायद भगवान ने दुनिया नहीं बनाई होगी — क्योंकि यहाँ कुछ भी मेल नहीं खाता। ऐसा…
प्रेम मेरे लिए कभी प्रश्न नहीं रहा।
मैंने देखा है तृणों को ओस की बूँदों को थामते हुए,
नन्हें जीवों को अपनी माँ की खोज में भटकते हुए,
धरती को तपिश में बादलों के लिए तड़पते हुए,
और पतझड़ को बसंत की याद में बिलखते हुए।
मेरे लिए तो यही है प्रेम की सबसे संजीदा कहानी जहाँ पीड़ा भी करुणा में ढल जाती है,
और आँसू भी कविता बनकर बह निकलते हैं।
सत्ता ,संगठन और राजनेता राजनीति की मुख्य धुरी हैं। कहा जाता है कि अगर इनमें तालमेल है तो सब कुछ ठीक नजर आता है मगर कभी कभी इनमें वर्चस्व की लड़ाई छिड़ जाती है और फिर यह तयः करना मुश्किल होता है कि इन तीनों में से कौन बड़ा है ,सर्वश्रेष्ठ है या किसकी चलती है या किसकी सुनी जा रही है। देखा जाए तो संगठन ही सबसे बड़ा होता है क्योंकि संगठन ही सबको जोड़कर रखता है और संगठन के नीचे ही सब काम करते हैं और संगठन ही निर्णय करता है कि कौन चुनाव लड़ेगा और जीतकर सत्ता में जायेगा और कौन संगठन में काम करेगा। संगठन ही तयः करता है कि कौन राजा बनेगा और कौन मंत्री । इसलिए संगठन और संगठन का मुखिया ही बड़ा होता है। संगठन से अलग होकर चुनाव लड़ने वाले चारों खाने चित ही दिखाई दिए हैं।
सौर ऊर्जा केवल बिजली उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि पृथ्वी के भविष्य की रक्षा का संकल्प है। जब हम सूर्य की किरणों से ऊर्जा प्राप्त करते हैं, तो न सिर्फ़ प्रदूषण घटाते हैं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ पर्यावरण भी सुरक्षित करते हैं। गाँवों से लेकर शहरों तक सौर पैनलों की चमक आज विकास की नई दिशा दिखा रही है। यह ऊर्जा आत्मनिर्भरता, पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक बचत—तीनों का अद्भुत संगम है।
सभा के मध्य खड़ी द्रौपदी की आँखों में भय, अपमान और आक्रोश एक साथ उमड़ रहे थे। चारों ओर सत्ता के प्रतीक उपस्थित थे, पर न्याय कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। शकुनि के छल से आरंभ हुआ यह खेल अब उसकी अस्मिता पर आकर ठहर गया था। दुर्योधन की क्रूर मुस्कान और दुःशासन की निर्दयता ने सभा को और भी भयावह बना दिया था।
भीष्म और धृतराष्ट्र जैसे महान भी मौन थे, मानो धर्म स्वयं बंधन में जकड़ा हो। उस असहाय क्षण में द्रौपदी के भीतर से केवल एक ही पुकार उठी—कृष्ण। उसने अपने समस्त अहंकार, भय और पीड़ा को त्यागकर स्वयं को पूर्णतः उस परम शक्ति के हवाले कर दिया। और तभी, जब मानवता ने साथ छोड़ दिया, आस्था ने उसका हाथ थाम लिया—अदृश्य होकर भी कृष्ण उसकी लाज की रक्षा के लिए उपस्थित हो गए।
जयपुर में 20 फरवरी 2026 को आयोजित राजस्थान लेखिका साहित्य संस्थान का सम्मान समारोह शब्द, सृजन और स्त्री संवेदना का अद्भुत संगम बन गया। समारोह में प्रतिष्ठित साहित्यकारों को सम्मानित किया गया तथा ‘हौसलों की उड़ान’ सहित कई कृतियों का भव्य विमोचन हुआ।
स्त्री, हर ताले की चाबी अपने पास रखती है। घर के हर कोने में, हर रिश्ते में, वह सबकी ज़रूरतों और सपनों के ताले बड़ी आसानी से खोल लेती है। लेकिन विडंबना यह है कि उसके पास कभी अपनी ही मनमर्ज़ी की चाबी नहीं होती। दूसरों के लिए खुली हुई दुनिया के बीच, उसके अपने इच्छाओं का द्वार अकसर बंद रह जाता है।
एक छोटी-सी सल्तनत, कुछ किताबें, एक बिस्तर और दो दिल—इस कहानी में प्रेम के वे पल कैद हैं जो हँसी और आँसुओं के बीच कहीं मुकम्मल होते हैं। कभी झिझक, कभी झेंप, और एक आलिंगन—जो बरसों बाद भी उतना ही सुकून देता है जितना पहली बार।