सिर्फ हड्डियों का नहीं विटामिन डी
थकान, डिप्रेशन और दिल से जुड़ा अनदेखा रिश्ता भारत को सूरज का देश कहा जाता है, फिर भी एक चौंकाने वाली सच्चाई सामने है. हर दस में से लगभग आठ भारतीयों में विटामिन डी की कमी पाई जाती है. वर्षों तक हमें यही सिखाया गया कि विटामिन डी केवल हड्डियों के लिए जरूरी है. सच…
चूल्हे से किताब तक
खुशबू गोयल माँ, थोड़ी तो दया करो मुझ पर,पापा, आप ही समझाओ न।नहीं पकड़नी ये करछी मुझको,ज़रा कलम तो पकड़ाओ न। भैया भी तो पढ़ने जाता है,मुझको भी तो पढ़ाओ न।माँ, थोड़ी तो दया करो मुझ पर,पापा, आप ही समझाओ न। मेरे भी तो सपने हैं,करने उनको अपने हैं।मत सुलगाओ चूल्हे की अग्नि में मुझको,विद्यालय…
सितंबर अहा!
सितंबर आते ही ऋतु-संधि का मधुर प्रकाश धरती पर उतर आता है। बरखा की विदाई और शरद की मुस्कान एक साथ झलकने लगती है। खेतों में धान और मक्का लहलहाते हैं, तो आँगनों में गेंदा और कमल अपनी सुगंध बिखेरते हैं। यह महीना केवल प्रकृति के बदलते रंगों का ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्सवों का भी साक्षी है। पितृपक्ष की श्रद्धा और गणपति का उल्लास, दोनों एक साथ वातावरण को भक्ति और आनंद से भर देते हैं। नीलम-से गगन में पुखराज-सा सूरज चमकता है और मन के आँगन में एक नया उजास जगाता है। सचमुच, सितंबर नवजीवन का संदेश लेकर आता है।
हिन्दी : भारत के माथे की बिंदी
हिन्दी हमारे जीवन का परिचय है, यह ज्ञान की अमर ज्योति है और भारत के माथे की बिंदी है। भारतीय समाज के तन, मन और जीवन में रची-बसी हिन्दी अपनेपन का सागर है। इसकी मधुर वाणी में भाषण की गूंज है और कबीर का फक्कड़पन, तुलसी का समन्वय तथा सूरदास का वात्सल्य समाया हुआ है।मीराबाई का प्रेम, जायसी का वियोग और घनानंद की पीड़ा हिन्दी की संवेदनाओं में झलकती है। जयशंकर प्रसाद के आँसू, निराला का संघर्ष, पंत का परिवर्तन और महादेवी का रहस्यवाद इसमें जीवन का विस्तार पाते हैं।
सीधा सा गणित
‘सीधा सा गणित’ एक मार्मिक पारिवारिक कहानी है, जिसमें बहू के परिश्रम को अनदेखा कर दिया जाता है, लेकिन ससुर के स्नेहपूर्ण व्यवहार से रिश्तों की असली गरिमा सामने आती है। यह कहानी परिवार, सम्मान और प्रेम का सुंदर संदेश देती है।
मेरे घर आई एक नन्ही परी
रसोई के रोशनदान में बसे एक गौरेया जोड़े के घोंसले से निकली एक नन्ही-सी जान लेखक के जीवन का भावनात्मक हिस्सा बन जाती है। अंडे से निकलने, पंख उगने और पहली बार खुले आसमान में उड़ान भरने तक की उसकी यात्रा लेखक को अपने बच्चों के बचपन और जीवन के गहरे सत्य की याद दिलाती है। प्रकृति, मातृत्व, स्नेह और बिछड़ने की मधुर पीड़ा से सजी यह कहानी बताती है कि प्रेम का सबसे सुंदर रूप किसी को अपने पास बांधकर रखना नहीं, बल्कि उसे उड़ने की आज़ादी देना है।
“देह, निर्णय और दरारें”
पितृसत्ता केवल सामाजिक ढांचा नहीं, बल्कि एक गहराई से जड़ें जमाई मानसिक संरचना है जो पुरुष को सत्ता और स्त्री को ‘अन्य’ मानकर उसके श्रम, निर्णय और देह पर नियंत्रण स्थापित करती है। यह लेख पितृसत्ता की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, मनोवैज्ञानिक और आधुनिक सामाजिक परतों को खोलते हुए यह सवाल उठाता है कि आखिर हम ‘मनुष्य’ से ‘स्त्री’ और ‘पुरुष’ में कब और कैसे बंट गए?
एक दिवाली बचपन वाली…
वो दिवाली, जिसमें दीपक छोटे थे, पर हमारी खुशियाँ बहुत बड़ी। जिसमें घर की सफाई भी खेल थी, और कबाड़ में से गुम चीज़ मिल जाना किसी खजाने से कम नहीं। जिसमें पटाखों की आवाज़ें नहीं… हमारी हँसी की गूँज ज़्यादा थी।जिसमें मिठाईयों की खुशबू थी, और त्योहारों में सजे संस्कार। वो दिवाली… जो परंपरा के साथ हमारी मासूमियत को भी रोशन कर देती थी।
