हिन्दी : भारत के माथे की बिंदी 

अलका ओझा, लेखिका, मुंबई

पग-पग मेरा परिचय है हिन्दी,
ज्ञान की अमर ज्योति है हिन्दी।
भारत के माथे की बिंदी है हिन्दी,
भारतीयों का तन-मन-जीवन है हिन्दी।।

अपनेपन का सागर है हिन्दी,
मधुर वाणी का भाषण है हिन्दी।
कबीर का फक्कड़पन है हिन्दी,
तुलसीदास का समन्वय है हिन्दी।।

सूरदास का वात्सल्य है हिन्दी,
मीराबाई का प्रेम है हिन्दी।
जायसी का वियोग है हिन्दी,
घनानंद की पीर है हिन्दी।।

जयशंकर प्रसाद का आँसू है हिन्दी,
निराला का संघर्ष है हिन्दी।
पंत का नव-परिवर्तन है हिन्दी,
महादेवी का रहस्यवाद है हिन्दी।।

दिनकर का ओज और प्रेम है हिन्दी,
अज्ञेय का तारसप्तक है हिन्दी।
मुक्तिबोध की स्वप्निल दृष्टि है हिन्दी,
भारत के माथे की बिंदी है हिन्दी।।

9 thoughts on “ हिन्दी : भारत के माथे की बिंदी 

  1. वाह अलका, हिंदी हमारी शान है, हिंदी कितनी महान है।

      1. हिंदी से हिन्दुस्तान है, तभी तो ये देश महान हैं… खूब सुंदर तरीके से हिंदी का परिचय दिया है| Alka!!!! 🙂

  2. हिंदी से हिन्दुस्तान है, तभी तो ये देश महान हैं… खूब सुंदर तरीके से हिंदी का परिचय दिया है| Alka!!!! 🙂

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