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 हिन्दी : भारत के माथे की बिंदी 

हिन्दी हमारे जीवन का परिचय है, यह ज्ञान की अमर ज्योति है और भारत के माथे की बिंदी है। भारतीय समाज के तन, मन और जीवन में रची-बसी हिन्दी अपनेपन का सागर है। इसकी मधुर वाणी में भाषण की गूंज है और कबीर का फक्कड़पन, तुलसी का समन्वय तथा सूरदास का वात्सल्य समाया हुआ है।मीराबाई का प्रेम, जायसी का वियोग और घनानंद की पीड़ा हिन्दी की संवेदनाओं में झलकती है। जयशंकर प्रसाद के आँसू, निराला का संघर्ष, पंत का परिवर्तन और महादेवी का रहस्यवाद इसमें जीवन का विस्तार पाते हैं।

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