मातृभाषा
हिंदी को ही राष्ट्रभाषा होनी चाहिए
जब 1947 में देश को आज़ादी मिली, तब भाषा की बड़ी चिंता खड़ी हुई। हमारा भारत एक विशाल देश है, जहाँ विविध संस्कृतियाँ हैं, सैकड़ों भाषाएँ बोली जाती हैं, और हज़ारों बोलियाँ भी हैं। हर राज्य की अनेक मातृभाषाएँ हैं। ऐसे विशाल देश को आज़ादी के बाद निवास करने वाले असंख्य भाषाई, सांस्कृतिक और धार्मिक समूहों को एक साथ मिलाने का प्रयास भारत की नवनिर्माण सरकार कर रही थी। जबकि हमारे देश के पास स्वयं की कोई राष्ट्रीय भाषा ही नहीं थी।
मान वाणी हिंदी
“हिंदी अब केवल देश तक सीमित नहीं रही, विदेशों में भी उसका मान बढ़ा है। लोग हिंदी सुनते, समझते और अभिवादन में भी अपनाते हैं। फिर भी हमारे ही शैक्षणिक संस्थानों में बच्चों को यह सिखाया जाता है कि विकास अंग्रेज़ी से होगा, जबकि हिंदी बोलने पर मानो कोई अपराध कर दिया गया हो। यही हमारी सबसे बड़ी त्रासदी है।”
हिन्दी : भारत के माथे की बिंदी
हिन्दी हमारे जीवन का परिचय है, यह ज्ञान की अमर ज्योति है और भारत के माथे की बिंदी है। भारतीय समाज के तन, मन और जीवन में रची-बसी हिन्दी अपनेपन का सागर है। इसकी मधुर वाणी में भाषण की गूंज है और कबीर का फक्कड़पन, तुलसी का समन्वय तथा सूरदास का वात्सल्य समाया हुआ है।मीराबाई का प्रेम, जायसी का वियोग और घनानंद की पीड़ा हिन्दी की संवेदनाओं में झलकती है। जयशंकर प्रसाद के आँसू, निराला का संघर्ष, पंत का परिवर्तन और महादेवी का रहस्यवाद इसमें जीवन का विस्तार पाते हैं।
हिंदी : हिंद देश का हृदय स्पंदन
हिंदी हिंद देश का हृदय है। यह केवल एक भाषा नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, परंपरा और अस्मिता का ध्वज है। पौराणिक ग्रंथों की महिमा, संतों की वाणी और क्रांति के स्वर सभी हिंदी में गूँजते हैं। मां की लोरी-सी निर्मल और सभी रसों की खान यह भाषा राष्ट्र की आत्मा को स्पंदित करती है। कबीर, तुलसी, सूर, जायसी और मीरा की भक्ति की छवि इसमें झलकती है। यही कारण है कि हिंदी हमारी आन-बान-शान ही नहीं, बल्कि भारत का अभिमान है। हमें इसे केवल राजभाषा ही नहीं, बल्कि राष्ट्रभाषा का सम्मान देना चाहिए।
हिंदी में हँसी, हिंदी में प्यार
आज हिंदी दिवस पर सबको याद दिलाएँ – अंग्रेज़ी नहीं, अपनी प्यारी हिंदी बोलें! बात करें, हँसी-मज़ाक करें और इसे दिल से अपनाएँ। क्योंकि हिंदी है हमारी भाषा, हमारी पहचान।”
हिंदी पर बिंदी
हम सभी मिलकर हिंदी को अपना अत्यंत महत्वपूर्ण भाषा बनाना चाहते हैं। केवल अंग्रेज़ी के सहारे हमारा देश नहीं चमक सकता, इसलिए हमें हिंदी को आगे लाना होगा। आज से हम अपने सभी कार्य हिंदी में करेंगे और इसे देश की सर्वश्रेष्ठ पहचान दिलाएंगे। जब हम सभी हिंदी में संवाद करेंगे और अपने काम इसी भाषा में करेंगे, तभी देश का विकास वास्तविक रूप से संभव होगा। यह हमारा दृढ़ संकल्प है कि अंग्रेज़ी को राजभाषा मानने के बजाय हम हिंदी को अपनाएँगे और इसे सभी के बीच फैलाएँगे।
हिंदी दिवस: मातृभाषा की मौन पीड़ा
हिंदी मेरी कविता के भाल की बिंदी है, जिसने हर प्रसंग में मेरा साथ निभाया और सहज-सरल भाषा से मेरे गीतों को ढाल दिया। लेकिन यह पीड़ा भी साथ है कि अंग्रेज़ों से मिली आज़ादी के बाद भी हम अंग्रेज़ी के ग़ुलाम बने बैठे हैं। मातृभाषा की दुर्दशा देखकर दिल रो उठता है। हिंदी मस्तक की अट्टालिका से औंधे मुँह गिरती दिखाई देती है और अंतर्मन चीत्कार कर उठता है कि जिस देश को अथाह परिश्रम से आज़ादी मिली, वहाँ हिंदी का तिरस्कार क्यों? यह कैसी विडंबना और कैसी बर्बादी है!
हिन्दी से है मेरी पहचान
यह कविता हिंदी भाषा के प्रति प्रेम और गर्व को उजागर करती है। हिंदी केवल हमारी मातृभाषा ही नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, ज्ञान और संस्कारों का प्रतीक भी है। यह कविता हमें याद दिलाती है कि हिंदी हमारे जीवन, साहित्य और राष्ट्र की आत्मा का अभिन्न हिस्सा है।
तू ही मेरा श्रृंगार
सविता सिंह मीरा, प्रसिद्ध कवयित्री, जमशेदपुर संस्कार, सदाचार,विचार, आचार —तू ही मेरा श्रृंगार। अलंकार, उपहार,आकार, निराकार —सब तेरे ही हैं प्रकार। नदी, पोखर, ताल, तलैया,तू ही सबकी खेवईया।शाखा, वल्लरी, द्रुम, लता,प्रकृति की सुंदर छटा।वर्षा, ओस, बादल, घटा,खग, मृग, बाल गोपाल,राम, केशव, नंदलाल। धूप, छाँव, अंबर, धरा —यह सब तो तेरे हैं रूप।तू ना हो तो…
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