
निधि श्रीवास्तव, प्रसिद्ध लेखिका
मीठी बोली देश की मेरी,
जिसका मान विदेश भी करता है।
हिंदी के सम्मान की खातिर
वो हिंदी सुनता और समझता है।
हिंदी में अभिवादन करता,
हिंदी में संबोधन सुनता।
देश-विदेश की चर्चाओं में
हिंदी का अब डंका बजता।
कुछ लोगों के सर पर अब भी
अंग्रेज़ी का भूत दिखता,
नवजीवन के अंकुर से जो
अंग्रेज़ी में बात करता।
यही त्रासदी
विद्या के मंदिर में भी पाई जाती है।
बचपन को सम्पूर्ण लगन से
अंग्रेज़ी सिखलाई जाती है।
सिखलाया जाता है उनको
कि विकास अंग्रेज़ी से है,
और हिंदी भाषा बोलने पर
जुर्माना लगाया जाता है।
फिर काश कोई कानून बने,
फिर हिंदी जन की वाणी बने।
पर बने तो अब व्यवहार-जगत में,
न कि केवल लेख-आलेख जगत में।
अब बने नियम कि
हिंदी में सब कार्य कराया जाएगा,
और हिंदी को अब
सही अर्थों में
राजभाषा बनवाया जाएगा।
