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तू ही मेरा श्रृंगार

सविता सिंह मीरा, प्रसिद्ध कवयित्री, जमशेदपुर

संस्कार, सदाचार,
विचार, आचार —
तू ही मेरा श्रृंगार।

अलंकार, उपहार,
आकार, निराकार —
सब तेरे ही हैं प्रकार।

नदी, पोखर, ताल, तलैया,
तू ही सबकी खेवईया।
शाखा, वल्लरी, द्रुम, लता,
प्रकृति की सुंदर छटा।
वर्षा, ओस, बादल, घटा,
खग, मृग, बाल गोपाल,
राम, केशव, नंदलाल।

धूप, छाँव, अंबर, धरा —
यह सब तो तेरे हैं रूप।
तू ना हो तो बोले क्या?
तू ना हो तो सोचे क्या?
तू ना हो तो लिखे क्या?

तू जननी, तू गरीयसी,
तू सबकी है प्रेयसी।
तू हो तो हम सब निहाल,
तू है मेरे देश की भाल।
तू गंगा, तू कालिंदी,
मेरे हिंद की तू हिंदी।
मेरे हिंद की तू हिंदी।

तू है तो भाव है,
सब तेरा ही प्रभाव है।
तू अगर न हो —
तो बस अभाव ही अभाव है।

तू सबकी है परिभाषा,
तुझसे है सबको आशा।
तू सबकी है राष्ट्रभाषा,
तू सबकी है राष्ट्रभाषा।

जय हिंद! जय हिंदी!

3 thoughts on “तू ही मेरा श्रृंगार

  1. हिंदी संस्कृत से आई है
    बहुत सटीक- सशक्त व्याकरण लाई है
    हर क्षेत्र – प्रदेश ने कुछ इससे समानता पाई है
    सब भाषाओं की ” जगदम्बा ” है
    किसी की व्यावहारिक भाषा
    किसी ने मां- बोली पाई है
    हिंदी एक दिवस नहीं , पूरे जीवन में समाई है

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