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हिन्दी से है मेरी पहचान

यह कविता हिंदी भाषा के प्रति प्रेम और गर्व को उजागर करती है। हिंदी केवल हमारी मातृभाषा ही नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, ज्ञान और संस्कारों का प्रतीक भी है। यह कविता हमें याद दिलाती है कि हिंदी हमारे जीवन, साहित्य और राष्ट्र की आत्मा का अभिन्न हिस्सा है।

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तू ही मेरा श्रृंगार

सविता सिंह मीरा, प्रसिद्ध कवयित्री, जमशेदपुर संस्कार, सदाचार,विचार, आचार —तू ही मेरा श्रृंगार। अलंकार, उपहार,आकार, निराकार —सब तेरे ही हैं प्रकार। नदी, पोखर, ताल, तलैया,तू ही सबकी खेवईया।शाखा, वल्लरी, द्रुम, लता,प्रकृति की सुंदर छटा।वर्षा, ओस, बादल, घटा,खग, मृग, बाल गोपाल,राम, केशव, नंदलाल। धूप, छाँव, अंबर, धरा —यह सब तो तेरे हैं रूप।तू ना हो तो…

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