हिंदी भाषा के सम्मान और राष्ट्रभाषा के गौरव को दर्शाता भारतीय दृश्य

हिंदी का सम्मान करें

हिंदी भाषा के सम्मान और राष्ट्रभाषा के स्वर को सशक्त रूप में प्रस्तुत करती यह कविता भारत की सांस्कृतिक एकता और भाषाई गौरव का संदेश देती है।

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भारतीय साहित्य संकल्पना और वैश्विक प्रभाव पर मंथन

विश्व शिक्षक दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना, उज्जैन द्वारा मराठा मंदिर साहित्य शाखा, मुंबई एवं विश्व हिन्दी प्रचार प्रसार संस्थान, पुणे के सहयोग से दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संचेतना महोत्सव का भव्य शुभारंभ हुआ। इस अवसर पर “भारतीय साहित्य : संकल्पना और वैश्विक प्रभाव” विषय पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी एवं बहुभाषी कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया।
मुख्य अतिथि श्री सुरेश चंद्र शुक्ल ‘शरद आलोक’ (नॉर्वे) और मुख्य वक्ता प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा (उज्जैन) सहित देश-विदेश के अनेक विद्वानों ने भाग लिया। संगोष्ठी में भारतीय साहित्य की वैश्विक भूमिका, संस्कृति और आध्यात्मिक मूल्यों पर गहन विचार-विमर्श हुआ। शाम को हुए कवि सम्मेलन में भारत, अमेरिका और नॉर्वे के कवियों ने अपनी कविताओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। यह आयोजन साहित्यिक आदान-प्रदान, भारतीय विचारधारा और विश्व शांति के संदेश को समर्पित रहा।

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दयानंद महाविद्यालय में हिंदी उत्सव

19 सितंबर 2025 को दयानंद कला महाविद्यालय, लातूर में हिंदी दिवस बड़े उत्साह और गरिमा के साथ मनाया गया। इस अवसर पर हिंदी विभाग ने “नवचेतना” हिंदी साहित्य मंडल की स्थापना की, जो विद्यार्थियों को रचनात्मक अभिव्यक्ति का मंच देगा। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन और महर्षि दयानंद सरस्वती की प्रतिमा वंदना से हुआ। मुख्य अतिथि श्री बजरंग पारिख ने हिंदी भाषा की महत्ता और वर्तमान समाज में इसकी प्रासंगिकता पर विस्तार से चर्चा की। प्रधानाचार्य डॉ. शिवाजी गायकवाड़ ने कहा कि हिंदी केवल संवाद की भाषा नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और आत्मा की अभिव्यक्ति है। छात्रों ने भावनात्मक और प्रेरणात्मक कविताएँ प्रस्तुत कीं और हिंदी के प्रति अपने कर्तव्यों का संकल्प लिया।

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संतोष कुमार झा का कविता संग्रह “स्याही का सिपाही”

हिंदी दिवस के अवसर पर गांधीनगर, गुजरात में आयोजित 5वें अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन के दौरान कोंकण रेलवे कॉर्पोरेशन लिमिटेड (केआरसीएल) के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक संतोष कुमार झा के चौथे काव्य संग्रह “स्याही का सिपाही” का विमोचन किया गया। पुस्तक का विमोचन भारत सरकार के केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) तथा संसदीय कार्य राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, राज्यसभा सांसद डॉ. दिनेश शर्मा, वैज्ञानिक डॉ. आनंद रंगनाथन और भारत सरकार की सचिव (राजभाषा) श्रीमती अंशुलि आर्या द्वारा संयुक्त रूप से किया गया।

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 हिंदी : हिंद देश का हृदय स्पंदन 

हिंदी हिंद देश का हृदय है। यह केवल एक भाषा नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, परंपरा और अस्मिता का ध्वज है। पौराणिक ग्रंथों की महिमा, संतों की वाणी और क्रांति के स्वर सभी हिंदी में गूँजते हैं। मां की लोरी-सी निर्मल और सभी रसों की खान यह भाषा राष्ट्र की आत्मा को स्पंदित करती है। कबीर, तुलसी, सूर, जायसी और मीरा की भक्ति की छवि इसमें झलकती है। यही कारण है कि हिंदी हमारी आन-बान-शान ही नहीं, बल्कि भारत का अभिमान है। हमें इसे केवल राजभाषा ही नहीं, बल्कि राष्ट्रभाषा का सम्मान देना चाहिए।

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हिंदी पर बिंदी

हम सभी मिलकर हिंदी को अपना अत्यंत महत्वपूर्ण भाषा बनाना चाहते हैं। केवल अंग्रेज़ी के सहारे हमारा देश नहीं चमक सकता, इसलिए हमें हिंदी को आगे लाना होगा। आज से हम अपने सभी कार्य हिंदी में करेंगे और इसे देश की सर्वश्रेष्ठ पहचान दिलाएंगे। जब हम सभी हिंदी में संवाद करेंगे और अपने काम इसी भाषा में करेंगे, तभी देश का विकास वास्तविक रूप से संभव होगा। यह हमारा दृढ़ संकल्प है कि अंग्रेज़ी को राजभाषा मानने के बजाय हम हिंदी को अपनाएँगे और इसे सभी के बीच फैलाएँगे।

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हिन्दी से है मेरी पहचान

यह कविता हिंदी भाषा के प्रति प्रेम और गर्व को उजागर करती है। हिंदी केवल हमारी मातृभाषा ही नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, ज्ञान और संस्कारों का प्रतीक भी है। यह कविता हमें याद दिलाती है कि हिंदी हमारे जीवन, साहित्य और राष्ट्र की आत्मा का अभिन्न हिस्सा है।

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तू ही मेरा श्रृंगार

सविता सिंह मीरा, प्रसिद्ध कवयित्री, जमशेदपुर संस्कार, सदाचार,विचार, आचार —तू ही मेरा श्रृंगार। अलंकार, उपहार,आकार, निराकार —सब तेरे ही हैं प्रकार। नदी, पोखर, ताल, तलैया,तू ही सबकी खेवईया।शाखा, वल्लरी, द्रुम, लता,प्रकृति की सुंदर छटा।वर्षा, ओस, बादल, घटा,खग, मृग, बाल गोपाल,राम, केशव, नंदलाल। धूप, छाँव, अंबर, धरा —यह सब तो तेरे हैं रूप।तू ना हो तो…

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मैं और मेरी हिंदी

जब से मैंने हिंदी लेखन शुरू किया है, कई हिंदी के धुरंधरों की तीखी नज़रों से नज़र बचाते हुए घूम रहा हूँ। उन्हें ऐसा लगने लगा है कि मैंने उनका एकाधिकार छीन लिया है। मैं, जो अंग्रेज़ी दवा का डॉक्टर होकर सारी ज़िंदगी फिरंगी भाषा की चाकरी में लगा रहा, अब अचानक हिंदी भाषा में लिखने का क्या चस्का लग गया?
फेसबुक पर मेरे एक पुरातात्विक-कालीन हिंदी के गुरुजी जुड़े हुए हैं, जो मेरे हर एक लेख को बारीकी से देखते हैं। मुझे लगता है कि मेग्निफाइंग ग्लास का प्रयोग करते होंगे। ऐसा नहीं लगता कि मोबाइल में फॉण्ट को उँगलियों से ज़ूम करना भी उन्हें आता होगा! हमें ऐसा लगता है जैसे हम वापस स्कूल में आ गए हैं।

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हिन्दी दिवस बीत जाए

हिंदी स्वयं को एक दिन की रानी और भाषाओं की नानी कहती है। उसकी बहन उर्दू है, जिसके साथ उसे सदा बने रहना है। हिंदी चाहती है कि वह फूले-फले और खूब आगे बढ़े। वह आग्रह करती है कि लोग उसे सिर्फ उसके दिवस पर ही नहीं, बल्कि हर दिन याद करें, पढ़ें और लिखें।

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