आन है हिंदी

हिंदी हमारी मातृभाषा ही नहीं, बल्कि देश का सम्मान और अभिमान है। इसमें प्रेम बसता है, स्वरों की मधुर तान गूंजती है और हर शब्द अपनी सरस लय से हृदय को छू लेता है। यह हमारी सभ्यता और सरल आचरण की पहचान है, जो चरित्र को निखारती और राष्ट्र की शान को बढ़ाती है। हिंदी के बिना ज्ञान अधूरा है, इसलिए इसे सदा सर्वोपरि रखना ही हमारा कर्तव्य है।

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लेखन मेज़ पर बैठे कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद, पृष्ठभूमि में लमही गाँव और उनकी साहित्यिक विरासत को दर्शाता यथार्थवादी दृश्य।

ये कैसा दिवस?

हर वर्ष हम माता-पिता दिवस मनाते हैं, हिंदी दिवस मनाते हैं, और इसी तरह कई अन्य दिवस भी मनाते हैं। इन्हीं में एक दिन हम कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद का जन्म दिवस भी मना लेते हैं। फिर सब कुछ समाप्त। क्या एक दिन का स्मरण उनके सम्मान के लिए पर्याप्त है? हम कभी यह सोच भी नहीं पाते कि जिस तरह बंगाल ने रवींद्रनाथ टैगोर के गीत, संगीत, कला और साहित्य को न केवल सहेज कर रखा है, बल्कि उसे अपनी जीवनशैली में आत्मसात किया है — उसी तरह हमें भी अपने साहित्यकारों को सम्मान देना चाहिए। बंगाल का समाज अपने बच्चों को, आधुनिक होते परिवेश में भी, रवींद्रनाथ के प्रति सम्मान भाव से परिचित कराता है। समय-समय पर उनके सम्मान में आयोजन होते हैं।

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प्रोफेसर अजहर हाशमी नहीं रहे

“हर विषय और हर शख्सियत पर जब वे लिखते हैं, तो पढ़ने वाला पढ़ता ही रह जाता है।”
यह पंक्ति प्रोफेसर हाशमी की अद्भुत लेखनी और ज्ञान की गहराई को दर्शाती है, जिससे पाठक मंत्रमुग्ध हो जाते थे।

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