
अंशु गुप्ता, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल)
क्या हक है उसे?
खुद के लिए जीने का?
खुद के लिए सोचने का?
इंसान है वो भी, कोई देखे तो
तैयार हैं सभी उससे एहसान लेने को।
प्यार उसे भी चाहिए होता है,
दो बात उसे भी करना होता है।
चुपचाप सब कुछ सह जाती है,
जो भी कहा जाए, मान जाती है।
घिस रही है पाँव के तले,
वो दुख बेचारी किसे कहे?
सोचा है कभी कि पूछ लें उसका हाल?
हरदम रहती हैं उसकी आँखें लाल।
मलाल है उसे कि वो जन्मी क्यों?
पूछती है हर बात मुझे ही सुननी क्यों?
क्या मैं अपने लिए जी नहीं सकती?
अपने लिए कुछ कर नहीं सकती?
ये कैसा पाप है
लगता जैसे जन्म लेना ही अभिशाप है।
पकड़ूँगी मैं अपना हाथ,
दूँगी मैं सिर्फ़ अपना साथ
हक मुझे भी है जीने का।

Behtareen kavita 🌹❣️
अति उत्तम रचना 💫
Bahut badiyaaaa ❤️😭