विचार विमर्श
सामाजिक विमर्श की अहमियत और आत्महत्या रोकने के बहुआयामी प्रयासों की ज़रूरत पर प्रकाश डालता है। आंकड़े, मानसिक और आर्थिक कारण, और परिवार की भूमिका पर विचार करते हुए यह जागरूकता बढ़ाने का संदेश देता है।

सामाजिक विमर्श की अहमियत और आत्महत्या रोकने के बहुआयामी प्रयासों की ज़रूरत पर प्रकाश डालता है। आंकड़े, मानसिक और आर्थिक कारण, और परिवार की भूमिका पर विचार करते हुए यह जागरूकता बढ़ाने का संदेश देता है।
अपने यहाँ सबसे सस्ती चीज नमक मानी गई है। पर रुकिए, सबसे सस्ती चीज नमक नहीं है, बल्कि अपने यहाँ सबसे सस्ती चीज है आम आदमी की जान।
असल में आम आदमी कहीं भी, कैसे भी मर सकता है; मार दिया जाता है या व्यवस्था की लापरवाही उसे मार डालती है और अगले दिन सब भुला दिया जाता है। आम आदमी की जान इतनी सस्ती है कि रहनुमाओं को कोई फर्क ही नहीं पड़ता।
मंदिरों में पर्वों पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है और अफरातफरी से, रेल दुर्घटनाओं से, पुल गिर जाने से, बनती इमारत ढह जाने से, स्टेडियम में दर्शकों की भीड़ में मारामारी से, रेलवे स्टेशन पर कुचलने से, मेलों-ठेलों में दबने से, घंटों जाम लगने से आम आदमी की जान चली जाती है। आम आदमी की जान, जान नहीं बल्कि मामूली सी चीज है। टेंशन क्या लेना, रोज ही तो मरते हैं।
आज की राजनीति और सत्ता की भूख इतनी बेकाबू हो चुकी है कि उसने जनता की रोटी, ज़मीन और नौकरी तक निगल ली है। शासक वर्ग सबकुछ हड़पने के बाद भी संतुष्ट नहीं होता, मानो उन्हें किसी डकार तक की परवाह नहीं। आम इंसान का संघर्ष, उसका भूख-प्यास से जूझना, उनके लिए महज़ एक आँकड़ा या ख़बर बनकर रह गया है।