निशी और विनित परिणय सूत्र में बंधे

महिदपुर रोड के प्रतिष्ठित स्व. बापूलालजी कोचर एवं स्व. सजनबाई कोचर की पोत्री तथा श्री जितेंद्र कुमार कोचर (मावावाला) और श्रीमती अलका कोचर की पुत्री चि. सौ. कुमारी निशी कोचर का शुभविवाह शिवगढ़ (रतलाम) के सुप्रसिद्ध स्व. कालूरामजी एवं स्व. प्रेमकुंवरजी तांतेड़ के पौत्र तथा शाह श्री भूपेंद्रकुमार तांतेड़ और श्रीमती रेनुका तांतेड़ के सुपुत्र चि. विनीत तांतेड़ के साथ धूमधाम से सम्पन्न हुआ।

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सबसे सस्ती है आम आदमी की जान

अपने यहाँ सबसे सस्ती चीज नमक मानी गई है। पर रुकिए, सबसे सस्ती चीज नमक नहीं है, बल्कि अपने यहाँ सबसे सस्ती चीज है आम आदमी की जान।
असल में आम आदमी कहीं भी, कैसे भी मर सकता है; मार दिया जाता है या व्यवस्था की लापरवाही उसे मार डालती है और अगले दिन सब भुला दिया जाता है। आम आदमी की जान इतनी सस्ती है कि रहनुमाओं को कोई फर्क ही नहीं पड़ता।

मंदिरों में पर्वों पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है और अफरातफरी से, रेल दुर्घटनाओं से, पुल गिर जाने से, बनती इमारत ढह जाने से, स्टेडियम में दर्शकों की भीड़ में मारामारी से, रेलवे स्टेशन पर कुचलने से, मेलों-ठेलों में दबने से, घंटों जाम लगने से आम आदमी की जान चली जाती है। आम आदमी की जान, जान नहीं बल्कि मामूली सी चीज है। टेंशन क्या लेना, रोज ही तो मरते हैं।

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एक भारतीय महिला अकेले बैठी, चेहरे पर थकान और भीतर दबे भावों के साथ सोच में डूबी हुई

क्या हक है उसे ?

क्या मैं अपने लिए जी नहीं सकती? अपने लिए कुछ कर नहीं सकती?” यह सिर्फ एक सवाल नहीं, बल्कि हर उस स्त्री की आवाज़ है जो चुप रहकर सब सहती रही। यह कविता उसके भीतर उठते दर्द, आत्मसम्मान और अपने हक के लिए जागती चेतना की सच्ची अभिव्यक्ति है।

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सूरीनाम हिन्दी परिषद् का 48वाँ वार्षिकोत्सव उत्साहपूर्वक संपन्न

हिन्दी भाषण प्रतियोगिता व सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने मोहा मन सूरीनाम हिन्दी परिषद् का 48वाँ स्थापना दिवस एवं हिन्दी पखवाड़े का शुभारंभ पाँच सितंबर को धूमधाम से मनाया गया। इस अवसर पर “हिन्दी भाषण प्रतियोगिता” का आयोजन किया गया, जिसमें प्रतिभागियों ने अपनी वक्तृत्व कला से श्रोताओं को प्रभावित किया। कार्यक्रम का शुभारंभ श्री करन जागेसर…

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कविता और किताब को प्रेम के प्रतीक के रूप में दर्शाता भावनात्मक दृश्य, जिसमें शब्दों के माध्यम से स्नेह और आत्मीयता का एहसास झलकता है

उपहार में शब्द

यह कविता उपहारों से परे शब्दों के स्नेह को महत्व देती है, जहाँ प्रेम फूलों या वस्तुओं में नहीं, बल्कि लिखी और पढ़ी गई कविताओं तथा किताबों के भावनात्मक स्पर्श में बसता है।

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“एक जैकेट, एक बच्चा… और पूरा समाज नंगा”

सर्दियों की परतों में लिपटा एक आदमी, और उसी सड़क पर नंगे पाँव खड़ा एक बच्चा हितेश। कुछ ही सवालों में उसकी पूरी दुनिया खुल जाती है: शराब में डूबे पिता, रजाइयाँ बेचती माँ, स्कूल से कोसों दूर सपने, और नीम के नीचे गुज़ारी हर रात। ठिठुरन उस बच्चे की नहीं, उस आदमी की आत्मा में घुसती है, जो अपनी जैकेट उतारकर भी खुद को नग्न महसूस करता है। हितेश की मासूमियत जैकेट पर डियो छिड़ककर “आपसे बदबू नहीं आएगी” कहना उसकी गरीबी से कहीं ज़्यादा क्रूर है।

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छत पर खड़ी आत्मविश्वासी भारतीय महिला”

ख्वाहिशें

“ख्वाहिशें” एक प्रेरणादायक हिंदी कविता है, जो महिलाओं को अपने सपनों को जीने और खुद के लिए खड़े होने का साहस देती है। यह कविता समाज की उन बंदिशों को चुनौती देती है, जो अक्सर महिलाओं की इच्छाओं और स्वतंत्रता को सीमित कर देती हैं।

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नारी केवल एक रिश्ता नहीं… वह सृष्टि की जननी, शक्ति, त्याग, भक्ति और साहस का स्वरूप है।

ईश्वर की सबसे अद्भुत रचना : नारी

यह ओजपूर्ण कविता नारी के विविध स्वरूपों—ममता, शक्ति, त्याग, भक्ति और साहस—का भावपूर्ण चित्रण करती है। गार्गी, सावित्री, लक्ष्मीबाई, मीरा और दुर्गा जैसी महान नारियों के माध्यम से स्त्री के अद्भुत अस्तित्व और उसकी अनंत ऊर्जा को दर्शाया गया है।

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 वो लड़की

सोमेश की कंपनी में नया प्रोजेक्ट शुरू हुआ था, इसलिए अब उसे ऑफिस में ज़्यादा देर तक रुकना पड़ता था. इस बात से उसका मन खिन्न हो रहा था. दस बजे की मेट्रो से उतरकर वह ऑटो की ओर बढ़ा. जैसे ही वह ऑटो में बैठा, वैसे ही एक खुशबू का झोंका उसकी नाक से टकराया.
रुको, मुझे भी ले चलो, लगभग हांफते हुए उस लड़की ने कहा.
वो खूबसूरत चेहरा, हिरणी सी आंखें, बाल हवा में बिखरे हुए, साड़ी पहने हुए थी. कहते-कहते ही वह बैठ गई.अरे! ऐ, इन साहब ने ऑटो रुकवाया है, तुम किसी और में चली जाओ, ऑटो वाले ने डपटते हुए कहा.

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संविधान: अधिकारों की आज़ादी या प्रतिबंधों की जकड़न?

26 नवम्बर का दिन हमारे लोकतंत्र के इतिहास में विशेष महत्व रखता है। इसी दिन 1949 में भारतीय संविधान को अंगीकार किया गया था। किताबों में हमने पढ़ा कि यह संविधान हमें मौलिक अधिकार देता है. बोलने की स्वतंत्रता, जीने का अधिकार, धर्म मानने की आज़ादी, समानता का अधिकार और भी बहुत कुछ। लेकिन जैसे-जैसे जीवन को समझा और समाज को करीब से जाना, महसूस हुआ कि किताबों और असल ज़िंदगी के बीच एक खाई है।

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