
सुरभि ताम्रकार, लेखिका, दुर्ग
तुम जब मिलने आओ तो
ना लाना कोई फूल, ना ही कोई गुलदस्ता।
ना ही कोई मेरी पसंदीदा चीज
मेरे उपहार के लिए।
तुम लाना अपनी लिखी कोई कविता मेरे लिए,
और अगर नहीं ला पाए वह कविता-ग्रंथ,
तो लाना अपनी पढ़ी हुई
कोई करीबी किताब मेरे लिए।
क्योंकि मैं हिस्सा होना चाहती हूँ
उस स्नेहिल स्पर्श का,
जिसे पढ़ने के क्रम में
तुमने अपना लिया।
वे शब्द जो तुम्हारे हो गए,
अब…
मुझे तुम्हारी भावनाओं का एहसास कराएँगे
अपनी ही उँगलियों के स्पर्श से
पढ़ते हुए।
मैं भी स्नेहिल होती जाऊँगी
तुम्हारे शब्दों की तरह।

बहुत ही खूबसूरत भावाभिव्यक्ति, शब्दों से प्यार! खूबसूरत रचना 👌👌
वाह
बहुत सुंदर भावपूर्ण कविता 👌
सुंदर उपहार